भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 356 में से

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पृष्ठ 224

188 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे [बायाँ पृष्ठ / Left Column] अर्द्धभाग सेंधा नमक मिलाकर नींबू के रस के साथ एक दिन निरन्तर (लगातार) घोटते रहें, इसके पश्चात् पारद के समान भाग राई, लहसुन तथा नौसादर के साथ मिलाकर तुषाम्बु (जौ की काँजी, देखें-शा० सं० म० खं० अ० 10) से मर्दन करें। तत्पश्चात् उक्त सब (राई, लहसुन, नौसादर तथा पारद) द्रव्यों की टिकिया बनाकर और उस पर हींग का लेप करके सुखा लें। इस टिकिया को हँडिया के तलभाग में रख दें और ऊपर से पिसा हुआ सैन्धव लवण भर दें। इस हँडिया के मुख पर दूसरी हँडिया का मुख जोड़कर कपड़मिट्टी द्वारा अत्यन्त दृढ़ कर दें। इसे सुखाकर चूल्हे पर रखकर नीचे मन्द-मन्द अग्नि दें। ऊपर वाली हँडिया को शीतल जल से सींचते रहें (सूखने न दें) और अग्नि को तीक्ष्ण करते जायें। इस प्रकार तीन प्रहर की आँच देने से पारद का ऊर्ध्वपातन हो जाता है, अर्थात् पारद उड़कर ऊपर की हँडिया में लग जाता है और दोष-रहित हो जाता है। स्वांगशीतल होने पर ऊपर की हँडिया में लगा हुआ उत्तम पारद ग्रहण कर लें। **वक्तव्य-**प्रायः इसी विधि से पारद का शोधन किया जाता है। ऊर्ध्वपातन के समान ही अधःपातन तथा तिर्यक्पातन का भी विधान है। पारद के विविध संस्कारों को रसत्नसमुच्चय आदि रस-ग्रन्थों में देखें। गन्धक शोधन-विधि लोहपात्रे विनिक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत् ।। 13 ।। तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद् गन्धकजं रजः। विद्रुतं गन्धकं ज्ञात्वा दुग्धमध्ये विनिःक्षिपेत् ।। 14 ।। एवं गन्धकशुद्धिः स्यात् सर्वकार्येषु योजयेत्। लोहे के पात्र (बड़ा कड़छुल) में डालकर घी को तपायें। जब घी तप जाये या पिघल जाये तो समान भाग गन्धक का चूर्ण डाल दें और जब गन्धक पिघल जाये तो दूध में डाल दें। इस प्रकार गन्धक शुद्ध हो जाता है। इस (शुद्ध गन्धक) को सब कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये। **वक्तव्य-**गन्धक को अत्यन्त मन्द अग्नि पर पिघलाना चाहिये, अन्यथा गन्धक विवर्ण हो ही जाती है। दूध को चौड़े मुख वाले पात्र में डालना चाहिये और उसके मुख पर कपड़ा बाँध देना चाहिये, ताकि इसमें से छनकर गन्धक दूध में जाये और कंकड़-पत्थर आदि पदार्थ अलग हो जायें। गन्धक को दूध में से निकालकर तथा उष्ण जल में अनेक बार धोकर सुखाकर रख लें। [दायाँ पृष्ठ / Right Column] शिंगरफ शोधन-विधि मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् ।। 15 ।। सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम्। दरद (शिंगरफ) को भेड़ के दूध की एवं नींबू के रस की सात-सात भावनायें देनी चाहिये और भली-भाँति उसे ये पीसना चाहिये। इस प्रकार वह अवश्य शुद्ध हो जाता है। **वक्तव्य-**शिंगरफ पारद तथा गन्धक का यौगिक द्रव्य है। यह दो प्रकार का होता है-1. खनिज (जो खानों में से प्राप्त होता है) और 2. कृत्रिम, जो पारद तथा गन्धक के संयोग से बनाया जाता है। आजकल रूमी या नरमा नाम की जो शिंगरफ आती है, वे सब कृत्रिम ही हैं। इनमें से एक सेर में 12-13 छटाँक पारद निकल जाता है। शिंगरफ से पारा निर्माण-विधि निम्बूरसैर्निम्बपत्ररसैर्वा याममात्रकम् ।। 16 ।। पिष्ट्वा दरदमूर्ध्वं च पातयेत् सूतयुक्तिवत्। ततः शुद्धरसं तस्माद्गृह्णीत्वा कार्येषु योजयेत् ।। 17 ।। दरद (शिंगरफ) को नींबू के रस से अथवा नीम के पत्तों के रस से पीसकर और सुखाकर डमरू-यन्त्र द्वारा ऊर्ध्वपातन की विधि से पारद को उड़ा लें और स्वांग शीतल होने पर ऊपर के पात्र में से पारद को लेकर सभी कार्यों में प्रयुक्त करें। **वक्तव्य-**यह पारद सर्वथा शुद्ध होता है। इसके अन्यान्य संस्कार करने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। यदि संस्कार किये भी जायें तो अच्छा ही है। **डमरू यन्त्र निर्माण विधि-**एक हँडिया में द्रव्य डाल दिया जाता है और उसके मुख पर दूसरी हँडिया का मुख मिलाकर कपड़मिट्टी करके जोड़ दिया जाता है, बस यही 'डमरूयन्त्र' है। पारद को बुभुक्षित करने की विधि कालकूतो वत्सनाभः शृङ्गकश्च प्रदीपकः। हालाहलो ब्रह्मपुत्रो हारिद्रः सक्तुकस्तथा ।। 18 ।। सौराष्ट्रिक इति प्रोक्ता विषभेदा अमी नव। अर्कस्नेहुण्डधत्तूरलाङ्गलीकरवीरकम् ।। 19 ।। गुञ्जाऽहिफेनाविट्येताः सप्तोपविषजातयः। एतैर्विमर्दितः सूतश्छिन्नपक्षः प्रजायते ।। 20 ।। मुखं च जायते तस्य धातूंश्च ग्रसते क्षणात्।

  1. कालकूट, 2. वत्सनाभ (मीठा विष), 3. शृंगिक (सिंगिया), 4. प्रदीपक, 5. हालाहल, 6. ब्रह्मपुत्र, 7. हारिद्र,
  2. सक्तुक तथा 9. सौराष्ट्रिक-ये नौ पदार्थ विष कहे जाते हैं।