भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

194 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे प्लीहोदर, वातरक्त छर्दि, बवासीर तथा नासिका आदि द्वारा रक्तस्राव होने पर अनार के फूलों का रस खाँड मिलाकर देना चाहिये और सफेद दूब के रस की नस्य देनी चाहिये और छर्दि तथा हिचकी के कोप को शान्त करने के लिए बेर की गिरी, पीपल तथा मोर के पंख की भस्म को मधु मिलाकर देना चाहिये। यही विधि मृगांकपोट्टली, हेमगर्भपोट्टली, द्वितीय- हेमगर्भपोट्टली रस और सभी रसों में प्रयुक्त करनी चाहिये। यह 'लोकनाथ' नामक रस सभी रोगों को जीतता है। वक्तव्य-कौड़ियाँ भारी, पीली तथा गठीली लेनी चाहिये। यथा-'तुलनायां गुरुतरान्, पञ्चगुल्मान् दशद्विजान्। वराटानू स्थूलपीतांश्च रसकर्मणि योजयेत्।।' उक्त रस के वर्णन में जो-जो पथ्य, अपथ्य एवं अनुपान कहे गये हैं, उन्हें भली-भाँति स्मरण रखना चाहिये, क्योंकि इनका प्रायः सभी रसों में प्रयोग किया जा सकता है। लघु लोकनाथ रस (वराटभस्म मण्डूरं चूर्णयित्वा घृते पचेत्। तत्समं मारिचं चूर्णं नागवल्ल्या विभावितम् ।। 84 ।। तच्चूर्णं मधुना लेह्यमथवा नवनीतकैः । माषमात्रं क्षयं हन्ति यामे यामे च भक्षितम् ।। 85 ।। लोकनाथरसो ह्येष मण्डलाद् राजयक्ष्मनुत्।) वराटिका (कौड़ी की) भस्म एवं मण्डूर की भस्म को समान भाग में लेकर दोनों को समान भाग घी में पकायें। जब घी पक जाये या जीर्ण हो जाये तो चूल्हे पर से उतार कर पीस लें और इसमें समान भाग मरिच का कपड़छन चूर्ण मिलाकर पान के रस की भावना देकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को मधु अथवा मथन के साथ खाना चाहिये। इसकी एक-एक माशा की मात्रा एक-एक पहर में खाने से राजयक्ष्मा को नष्ट करती है। यह 'लघुलोकनाथ रस' है। वक्तव्य-उक्त रस का सेवन एक दिन में 7-8 बार करना चाहिये। 'मण्डलात्' शब्द का अर्थ याज्ञवल्क्यस्मृति 1.354 की मिताक्षरा टीका में चार, छः, आठा, बारह या इससे भी अधिक बार कहा गया है जो यहाँ प्रसंगोचित है। मृगाङ्कपोट्टली रस भूर्जवत् तनुपत्राणि हेम्नः सूक्ष्माणि कारयेत् ।। 86 ।। तुल्यानि तानि सूतेन खल्वे क्षिप्त्वा विमर्दयेत् । काञ्चनाररसेनेव ज्वालामुख्या रसेन वा ।। 87 ।। लाङ्गल्या वा रसैस्तावद् यावद्भवति पिष्टिका । ततो हेम्नश्चतुर्थांशं टङ्कणं तत्र निक्षिपेत् ।। 88 ।। पिष्टमौक्तिकचूर्णं च हेमद्विगुणमावपेत् । तेषु सर्वसमं गन्धं क्षिप्त्वा चैकत्र मर्दयेत् ।। 89 ।। तेषां कृत्वा ततो गोलं वासोभिः परिवेष्टयेत् । पश्चान्मृदा वेष्टयित्वा शोषयित्वा च धारयेत् ।। 90 ।। शरावसम्पुटस्यान्तस्तत्र मुद्रां प्रदापयेत् । लवणापूरिते भाण्डे धारयेत् तं च सम्पुटम् ।। 91 ।। मुद्रां दत्त्वा शोषयित्वा बहुभिर्गोमयैः पुटेत् । ततः शीते समाहृत्य गन्धं सूतसमं क्षिपेत् ।। 92 ।। घृष्ट्वा च पूर्ववत् खल्वे पुटेद् गजपुटेन च । स्वाङ्गशीतं ततो नीत्वा गुञ्जायुग्मं प्रयोजयेत् ।। 93 ।। अष्टभिर्मरिचैर्युक्तं कृष्णात्रययुतोऽथवा । विलोक्य देयो दोषादीनेकैका रसरक्तिका ।। 94 ।। सर्पिषा मधुना वापि दद्याद् दोषाद्यपेक्षया । लोकनाथसमं पथ्यं कुर्यात् स्वस्थमनाः शुचिः ।। 95 ।। श्लेष्माणं ग्रहणीं कासं श्वासं क्षयमरोचकम् । मृगाङ्कोऽयं रसो हन्यात् कृशत्वं बलहीनताम् ।। 96 ।। सुवर्ण के भोजपत्र जैसे पतले-पतले पत्र बनवा लें और इसको समान भाग पारद के साथ खरल में डालकर कचनार के रस, ज्वालामुखी के रस अथवा कलिहारी के रस से तब तक मर्दन करें, जब तक सुवर्ण और पारद की पीठी-सी बन जाये। तत्पश्चात् सुवर्ण से चतुर्थांश टङ्कण (सोहागा) डाल दें और सुवर्ण से द्विगुण-मोती का पिसा हुआ चूर्ण मिला दें तथा सबके समान भाग शुद्ध गन्धक डालकर एक साथ भली-भाँति मर्दन करें। तत्पश्चात् उपर्युक्त रसों के योग से इनका गोला बनाकर कपड़ों से लपेट दें। तदनन्तर मिट्टी का मोटा लेप देकर और सुखा कर दो शरावों (सिकोरों) के सम्पुट में रख दें और भली-भाँति सन्धिरोध कर दें। तत्पश्चात् सम्पुट को नमक के चूर्ण से भरे हुये पात्र (लवण-यन्त्र) में दबाकर रख दें फिर इस पात्र का बन्द करके बहुत से उपलों की पुट दें। तत्पश्चात् स्वांगशीतल हो जाने पर निकाल कर पारद के समान भाग गन्धक डालकर खरल में मर्दन करके पूर्ववत् 1 गजपुट में पुट दे दें। स्वांगशीतल होने पर निकाल कर रख लें। इसमें से दो रत्ती की मात्रा आठ मरिचों के चूर्ण के साथ अथवा तीन पीपल के चूर्ण के साथ मिलाकर देनी चाहिये, अथवा दोष, देश तथा रोगी की शारीरिक स्थिति को देखकर एक-एक रत्ती का मात्रा दें। दोष तथा रोग आदि का विचार करके घी तथा मधु के साथ भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by eGangotri