भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 356 में से

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पृष्ठ 241

द्वादशोऽध्यायः ] रसकशोधनमरणकल्पना 205 शुद्ध पारद, शुद्ध विष एवं शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर सबके समान भाग में काली मिरच का चूर्ण मिलाकर भली-भाँति पीसना चाहिये। कण्टकारी (भटकटैया) के फलों के रस से इक्कीस बार भावना दें। तत्पश्चात् तीन-तीन रत्ती की गोलियाँ बनायें। सभी प्रकार के अजीर्ण की शान्ति के लिए इन्हें खाना चाहिये। यह 'अजीर्णकण्टक रस' विसूची (हैजा) को भी नष्ट करता है। वक्तव्य-विसूची (हैजा) में प्याज के रस या लौंग, पुदीना, बड़ी इलायची एवं सौंफ के क्वाथ के साथ देने पर यह रस शीघ्र लाभ करता है। मन्थानभैरव रस मृतं सूतं मृतं ताम्रं हिङ्गु पुष्करमूलकम्। सैन्धवं गन्धकं तालं कटुकीं चूर्णयेत् समम् ॥ २२८ ॥ पुनर्नवादेवदालीनिर्गुण्डीतण्डुलीयकैः । तिक्तकोशातकीद्रावैर्दिनैकं मर्दयेद् दृढम् ॥ २२९ ॥ माषमात्रं लिहेत् क्षौद्रै रसं मन्थानभैरवम्। कफरोगप्रशान्त्यर्थं निम्बक्वाथं पिबेदनु ॥ २३० ॥ रससिन्दूर, ताम्रभस्म, घृतभृष्ट हींग, पोहकरमूल, सेंधा नमक, शुद्ध गन्धक, शुद्ध हरिताल एवं कुटकी को समान भाग में लेकर पीसना चाहिये फिर पुनर्नवा, बन्दालडोड़ा, निर्गुण्डी (सम्भालू), चौलाई एवं कडुवी तोरई के रस से एक-एक दिन तक भली-भाँति पीसना चाहिये। इसमें से एक माशा भर लेकर मधु के साथ मिलाकर कफ के रोगों की शान्ति के लिए इसे चाटना चाहिये। अनुपान के लिये नीम के पत्तों का क्वाथ पीना चाहिये। इस रस का नाम 'मन्थानभैरव रस' है। वातनाशन रस सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लोहं च माक्षिकम्। तालं नीलाञ्जनं तुत्थमहिफेनं समांशकम् ॥ २३१ ॥ पञ्चानां लवणानां च भागमेकं विमर्दयेत्। वज्रीक्षीरैर्द्दिनैकं तु रुद्ध्वाधो भूधरे पचेत् ॥ २३२ ॥ माषकैमार्द्रकद्रावैर्लेहयेद् वातनाशनम्। पिप्पलीमूलजक्वाथं सकृष्णामनुपाययेत् ॥ २३३ ॥ सर्वान् वातविकारांस्तु निहन्त्याक्षेपकादिकान्। रससिन्दूर, सुवर्णभस्म, वज्र (हीरा) भस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, शुद्ध हरिताल, शुद्ध काला सुरमा, शुद्ध तूतिया तथा अफीम, ये सब द्रव्य समान भाग (1-1 तोला) और पाँचों नमक एक भाग (1 तोला), लेकर सबको एक साथ पीसना चाहिये। इसे सेहुण्ड के दूध की एक बार भावना देकर सम्पुट में रखकर भूधर-यन्त्र में पकाना चाहिये, तत्पश्चात् एक माशा भर लेकर अदरक के रस के साथ खाना चाहिये। अनुपान-पीपलामूल के क्वाथ में पीपल का चूर्ण डालकर पीना चाहिये। यह 'वातनाशन रस' सभी प्रकार के आक्षेपक आदि वात-विकारों को नष्ट करता है। कनकसुन्दर रस कनकस्याष्टशाणाः स्युः सूतो द्वादशभिर्मतः ॥ २३४ ॥ गन्धोऽपि द्वादश प्रोक्तस्ताम्रं शाणद्वयोन्मितम्। अभ्रकं स्याच्चतुःशाणं माक्षिकं च द्विशाणिकम् ॥ २३५ ॥ वङ्गो द्विशाणः सौवीरं त्रिशाणं लोहमष्टकम्। विषं त्रिशाणिकं कृत्वा लाङ्गली पलसम्मिता ॥ २३६ ॥ मर्दयेद् दिनमेकं च रसैरम्लफलोद्भवैः। दद्यान्मृदुपुटं वह्नौ ततः सूक्ष्मं विचूर्णयेत् ॥ २३७ ॥ माषमात्रो रसो देयः सन्निपाते सुदारुणे। आर्द्रकस्वरसेनेव रशोनस्य रसेन वा ॥ २३८ ॥ किलासं सर्वकुष्ठानि विसर्प च भगन्दरम्। ज्वरं गरमजीर्णं च जयेद् रोगहरो रसः ॥ २३९ ॥ सुवर्णभस्म आठ शाण (2 तोला), शुद्ध पारद बारह शाण (3 तोला), शुद्ध गन्धक बारह शाण (3 तोला) (पारद-गन्धक की कज्जली बना लें), ताम्रभस्म दो शाण (आठ आना भर), अभ्रकभस्म चार शाण (1 तोला), सुवर्णमाक्षिक भस्म दो शाण (आधा तोला), वंगभस्म दो शाण (आधा तोला), सौवीर (सफेद सुरमा) भस्म तीन शाण (बारह आना भर), लोहभस्म आठ शाण (2 तोला), शुद्ध विष तीन शाण (बारह आना भर) और कलिहारी का कन्द एक पल (4 तोला), इन सबको लेकर अम्लफल (नींबू) के रस से एक दिन तक भली-भाँति पीसना चाहिये, फिर उसे सम्पुट में रखकर अग्नि में पुट दें, तत्पश्चात् उसे अत्यन्त सूक्ष्म पीस लें। यह 'कनकसुन्दर रस' की मात्रा एक माशा (एक आना भर) अदरक के रस अथवा लहसुन के रस के साथ भीषण सन्निपात में देना चाहिये। यह श्वेतकुष्ठ, अठारह प्रकार वो कुष्ठ, विसर्प, ज्वर, गर तथा अजीर्ण विकारों को जीतता है तथा सभी रोगों को हरता है। सन्निपातभैरव रस रसो गन्धस्त्रिकर्षः स्यात् कुर्यात्कज्जलिकां तयोः। ताम्रतारारवङ्गाहिहिसाराश्चैककार्षिकाः ॥ २४० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA