भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 207 ततो जयन्तीजम्बीरभृङ्गद्रावैर्विमर्दयेत्। त्रिवासरं ततो गोलं कृत्वा संशोष्य धारयेत् ।। 255 ।। लोहपात्रे शरावं च दत्त्वोपरि विमुद्रयेत् । अधो वह्निं शनैः कुर्याद् यामार्धं तत उद्धरेत् ।। 256 ।। रसतुल्यां प्रतिविषां दद्यान्मोचरसं तथा। कपित्थविजयाद्रावैर्भावयेत् सप्तधा पृथक् ।। 257 ।। धातकीन्द्रयवा मुस्ता लोध्रं बिल्वं गुडूचिका। एतद् रसैर्भावयित्वा वेलैकैकं चु शोषयेत् ।। 258 ।। रसं वज्रकपाटाख्यं शाणैकं मधुना लिहेत्। वह्निं शुण्ठीं बिडं बिल्वं लवणं चूर्णयेत् समम् ।। 259 ।। पिबेदुष्णाम्बुना चानु सर्वजां ग्रहणीं जयेत्। पारदभस्म (रससिन्दूर), अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक, जौखार, टंकण (अग्नि पर भुना हुआ सुहागा), अरणी की छाल तथा वच, इन द्रव्यों को रससिन्दूर के समान भाग में लें। तत्पश्चात् अरणी की छाल, जम्बीरी नींबू तथा भृङ्गराज (भाँगरा) के रस से तीन दिन तक मर्दन करें, तदनन्तर गोला बनाकर और सुखाकर लोहे की कड़ाही में रख दें, ऊपर से सिकोरा रखकर बन्द कर दें, आधा पहर तक नीचे से धीरे-धीरे अग्नि दें, तत्पश्चात् स्वांगशीतल होने पर उसे निकाल लें। फिर इस औषधि में रससिन्दूर के समान भाग अतीस तथा मोचरस मिला दें और कपित्थ (कैथ) फल तथा भाँग के रस की पृथक्-पृथक् सात-सात बार भावना दें, धाय के फूल, इन्द्रजौ, नागरमोथा, पठानीलोध, बेल को गूदी तथा गिलोय इन द्रव्यों का रस अथवा क्वाथ की एक-एक बार भावना देकर सुखा लें। इस 'वज्रकपाट' नामक रस की एक शाण (चार आना भर) की मात्रा को मधु के साथ चाटना चाहिये और चीता, सोंठ, बिरिया नमक, बेल का गूदी तथा सेंधा नमक को समान भाग में लेकर चूर्ण बना लें और उक्त रस के अनुपान में उष्ण जल के साथ पीयें। यह योग सन्निपातजनित ग्रहणीरोग को जीतता है। वक्तव्य-'सूततुल्यान् इमान्' इस पाठ के अनुसार मृतसूत अर्थात् रससिन्दूर 1 तोला लें, तो अभ्रक आदि छः द्रव्य मिलाकर एक तोला लें अथवा छः तोला ? दीपिकाकार दूसरा पक्ष ही मानते हैं, यही उचित भी है। मदनकामदेव रस तारं वज्रं सुवर्णं च ताम्रं सूतकगन्धकम् ।। 260 ।। लोहं क्रमविवृद्धानि कुर्यादेतानि मात्रया। विमर्द्य कन्यकाद्रावैर्न्यसेत् काचमये घटे ।। 261 ।। विमुच्य पिठरीमध्ये धारयेत् सैन्धवावृते। पिठरीं मुद्रयेत् सम्यक् ततश्चुल्ल्यां निवेशयेत् ।। 262 ।। वह्निं शनैः शनैः कुर्याद् दिनैकं तत उद्धरेत्। स्वाङ्गशीतं च सञ्चूर्ण्य भावयेदर्कदुग्धकैः ।। 263 ।। अश्वगन्धा च काकोली वानरी मुसलीक्षुरा। त्रित्रिवेलं रसैरासां शतावर्याश्च भावयेत् ।। 264 ।। पद्मकन्दकसेरूणां रसैः काशस्य भावयेत्। कस्तूरी व्योषकर्पूरकङ्कोलैलालवङ्गकम् ।। 265 ।। पूर्वचूर्णादष्टमांशमेतच्चूर्णं विमिश्रयेत्। सर्वैः समां शर्करां च दत्त्वा शाणोन्मितां पिबेत् ।। 266 ।। गोदुग्धद्विपलेनैव मधुराहारसेवकः। अस्य प्रभावात् सौन्दर्य बलं तेजोऽभिवर्धते ।। 267 ।। तरुणीं रमयेद् बह्वीः शुक्रहानिर्न जायते। तार (रजत या चाँदी) भस्म (1 तोला), वज्र (हीरा) भस्म (2 तोला), सुवर्णभस्म (3 तोला), ताम्रभस्म (4 तोला), शुद्ध पारद (5 तोला), शुद्ध गन्धक (6 तोला) तथा लोहभस्म (7 तोला)-इन सभी द्रव्यों को इस प्रमाण से ग्रहण करें और घीकुआर के रस से मर्दन कर (सुखाकर) काँच का शीशी (जिस पर सात बार कपड़मिट्टी की गई हो) में डाल दें, तत्पश्चात् शीशी की खड़िया-मिट्टी के डाट से मुख बन्द कर नाँद में भरकर सेंधा नमक के चूर्ण से ढँक दें और नाँद का मुखबन्द कर दें। तत्पश्चात् चूल्हा पर चढ़ाकर एक दिन तक धीरे-धीरे अग्नि दें, फिर स्वांगशीतल हो जाने पर औषध को निकाल लें और उसे पीसकर आक के दूध की भावना दें, फिर असगन्ध, काकोली, किवाँच, मूसली तथा तालमखाना के रस की, शतावरी के रस की तीन-तीन बार भावना दें। फिर कमलकन्द (कमलगट्टा), कसेरू तथा काश के रस का एक-एक बार भावना दें, तत्पश्चात् (सूख जाने पर) कस्तूरी, त्रिकटु, शुद्धकर्पूर, शीतलचीनी, छोटी इलायची तथा लौंग-इन सभी द्रव्यों का चूर्ण उपर्युक्त औषधि की अपेक्षा अष्टमांश मिला दें, फिर सम्पूर्ण औषध के समान भाग उत्तम शर्करा (चीनी) मिलाकर रख दें, इसमें से एक शाण (चार आना भर) लेकर दो पल (आधा पाव) गोदुग्ध के साथ सेवन करें। इन दिनों रोगी मधुर आहार का सेवन करता रहे। इसके प्रभाव से सौन्दर्य तथा तेज बढ़ता है मनुष्य बहुत-सी स्त्रियों से रमण कर सकता है और उसके शुक्र में न्यूनता नहीं आती।