भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 356 में से

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पृष्ठ 244

208 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

कन्दर्पसुन्दर रस

सूतो वज्रमहिर्मुक्ता तारं हेमासिताभ्रकम्।।२६८।। रसैः कर्षशिकानैतान् मर्दयेदिरिमेदजैः। प्रवालचूर्णं गन्धं च द्विद्वीकर्षं विमिश्रयेत् ।।२६९।। ततोऽश्वगन्धास्वरसैर्विमर्द्य मृगशृङ्गके। क्षिप्व्ता मृदुपुटे पक्त्वा भावयेद् धातकीरसैः।।२७०।। काकोली मधुकं मांसी बलात्रयबिसेङ्गुदम्। द्राक्षापिप्पलवन्दाकं वरी पर्णीचतुष्टयम्।।२७१।। परूषकं कसेरुश्च मधूकं वानरी तथा। भावयित्वा रसैरेषां शोषयित्वा विचूर्णयेत् ।। २७२ ।। एलात्वक्पत्रकं वांशी लवङ्गागरुकेशरम्। मुस्तं मृगमदः कृष्णा जलं चन्द्रश्च मिश्रयेत् ।। २७३ ।। एतच्चूर्णैः शाणमितै रसं कन्दर्पसुन्दरम्। खादेच्छणमितं रात्रौ सिता धात्री विदारिका ।।२७४।। एतासां कर्षचूर्णेनं सर्पिष्कर्षण संयुतम्। तस्यानु द्विपलं क्षीरं पिबेत् सुस्थितमानसः।।२७५।। रमणी रमयेद् बह्वीः शुक्रहानिर्न जायते।

रससिन्दूर, वज्र (हीरा) भस्म, नागभस्म, मोती की भस्म, रजत (चाँदी भस्म), सुवर्ण भस्म तथा कृष्णाभ्रकभस्म, इन सबको एक-एक कर्ष (1-1 तोला) लेकर दुर्गन्धि खैर के रस या क्वाथ से मर्दन करें फिर इसमें प्रवाल चूर्ण (भस्म या पिष्टि) तथा शुद्ध गन्धक दो-दो कर्ष (2-2 तोला) मिला दें, तत्पश्चात् असगन्ध के स्वरस से मर्दन कर (सुखाकर) मृगशृङ्ग (हरिण के सींग) में भर दें और मृदु पुट में पुट देकर धाय के फूलों के स्वरस की भावना दें और काकोली, मुलेठी, जटामांसी बलात्रय (बरियारा, कंघी तथा गंगेरन), बिस (कमल का जड़), इंगुदी, मुनक्का, पीपल, बन्दा, शतावर, शालपर्णी, पृष्टिपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी, फालसा, कसेरू, महुआ तथा किवाँच इन द्रव्यों के रस से भावना रेकर सुखाकर चूर्ण बना लें। फिर इसमें इलायची, दालचानी, तेजपत्ता, वंशलोचन, लौंग, अगरु, चन्दन, नागकेसर, नागरमोथा, कस्तूरी, पीपल, नेत्रबाला तथा शुद्ध कर्पूर, प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण एक-एक शाण (4-4 आना भर) मिला दें। इस रस का नाम 'कन्दर्प-सुन्दर रस' है। इसकी एक शाण (4 आना भर) की मात्रा चीनी, आँवला तथा विदारीझन्द का चूर्ण एक कर्ष (1 तोला) और घी एक कर्ष (1 तोला) के साथ मिलाकर खानी चाहिये। साथ में दो पल (10 तोला) दूध पीना चाहिये। तत्पश्चात्


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

धैर्ययुक्त होकर बहुत-सी स्त्रियों से रमण करे तो भी शुक्र की न्यूनता नहीं होती है।

लोह रसायन

शुद्धं रसेन्द्रं भागैकं द्विभागं शुद्धगन्धकम् ।।२७६।। क्षिपेत्कज्जलिकां कुर्यात् तत्र तीक्ष्णभवं रजः। क्षिप्व्ता कज्जलिकातुल्यं प्रहरैकं विमर्द्येत् ।। २७७ ।। ततः कन्याद्रवैर्घर्मे त्रिदिनं परिमर्दयेत्। ततः सञ्जायते तस्य सोष्मो धूमोद्गमो महान् ।। २७८ ।। अत्यन्तं पिण्डितं कृत्वा ताम्रपात्रे निधापयेत्। मध्ये धान्यकुशूलस्य त्रिदिनं धारयेद् बुधः ।। २७९ ।। उद्धृत्य तस्मात्खल्वे च क्षिप्त्वा घर्मे निधाय च। रसैः कुठारच्छिन्नायास्त्रिवेलं परिभावयेत् ।। २८० ।। संशोष्य घर्मे क्वाथैश्च भावयेत् त्रिकटोस्त्रिधा। वासामृताचित्रकाणां रसैर्भाव्यं क्रमात् त्रिधा ।। २८१ ।। लोहपात्रे ततः क्षिप्त्वा भावयेत् त्रिफलाजलैः। निर्गुण्डीदाडिमत्वग्भिर्भृङ्गशृङ्गकुरण्टकैः ।। २८२ ।। पलाशकदलीद्रावैर्बीजकस्य शृतेन च। नीलिकालम्बुषाद्रावैर्बब्बूलफलकारसैः ।। २८३ ।। भावयेत् त्रित्रिवेलं च ततो नागबलारसैः। शतावरीगोक्षुरभिः पातालगरुडीद्रवैः ।। २८४ ।। त्रित्रिवेलं यथ लाभं भावयेदेभिरौषधैः। ततः प्रातर्लिहेत् क्षौद्रघृताभ्यां कोलमात्रकम् ।। २८५ ।। पलमात्रं वराक्वाथं पिबेदस्यानुपानकम्। मासत्रयं शीलितं स्याद् वलीपलितानाशनम् ।। २८६ ।। मन्दाग्निं श्वासकासौ च पाण्डुतां कफमारुतौ। पिप्पलीमधुसंयुक्तं हन्यादेतन्न संशयः ।। २८७ ।। वातास्रं मूत्रदोषांश्च ग्रहणीं गुदजां रुजम्। अण्डवृद्धिं जयेदेतच्छिन्नासत्त्वमधुप्लुतम् ।। २८८ ।। बलवर्णकरं वृष्यमायुष्यं परमं स्मृतम्। जयेत् सर्वामयान् कालादिदं लोहरसायनम् ।। २८९ ।। कूष्माण्डं तिलतैलं च माषान्नं राजिकां तथा। मद्यमम्लरसं चैव त्यजेल्लोहस्य सेवकः ।। २९० ।।

शुद्ध पारद एक भाग (5 तोला) तथा शुद्ध गन्धक दो भाग (10 तोला) लेकर खरल में डालकर कज्जली बनाये, उसमें कज्जली के समान भाग (15 तोला), तीक्ष्ण लोह (फौलाद) का चूर्ण डालकर एक पहर तक मर्दन करें, तदनन्तर तीन दिन तक घीकुआर का रस डालकर मर्दन करें। इसके


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