भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 356 में से

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पृष्ठ 252

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द्वितीयोऽध्यायः स्वेदविधिः


[बायाँ स्तम्भ]

स्वेद की संख्या और गुण स्वेदश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तापोष्मस्वेदसञ्ज्ञकौ। उपनाहो द्रवः स्वेदः सर्वे वातार्तिहारिणः।। 1 ।। स्वेदौ तापोष्मजौ प्रायः श्लेष्मघ्नौ समुदीरितौ। उपनाहस्तु वातघ्नः पित्तसङ्गे द्रवो हितः ।। 2 ।। स्वेद चार प्रकार का कहा गया है-1. ताप, 2. ऊष्म, 3. उपनाह तथा 4. द्रव। ये सभी स्वेद वातजनित व्याधियों को नष्ट करते हैं। ताप तथा ऊष्म नामक स्वेद प्रायः कफरोगनाशक माने जाते हैं, उपनाह स्वेद वातनाशक होता है और यदि वातकफ के साथ पित्त का संयोग हो तो द्रवस्वेद लाभदायक होता है। वक्तव्य-प्रथम अध्याय में स्नेहविधि का वर्णन किया जा चुका है उसके बाद अब यहाँ से स्वेदविधि का निरूपण किया जा रहा है। उक्त स्वेदों का विशेष विवरण इसी अध्याय में आगे दिया गया है। वात-कफ के रोगों में ही स्वेदन उपयुक्त होता है, पित्त-विकारों में तो स्वेदन किया ही नहीं जाता।

स्वेद के भेद तथा प्रयोग महाबले महाव्याधौ शीते स्वेदो महान् स्मृतः। दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्ये मध्यतमो मतः ।। 3 ।। यदि बलवान् मनुष्य को बलवान् रोग शीतकाल में हो जाये तो अधिक से अधिक स्वेद किया जा सकता है। दुर्बल मनुष्य को दुर्बल रोग हो तो थोड़ा स्वेद कराना चाहिये और मध्यम श्रेणी तथा मध्यम बल वाले पुरुष को मध्यम (न बहुत थोड़ा न बहुत अधिक) स्वेद कराना उचित है। दोष भेद से स्वेद के भेद बलासे रूक्षणस्वेदो रूक्षस्निग्धः कफानिले। कफमेदोवृते वाते कीष्णं प्रावरणाह्वयः।। 4 ।।


[दायाँ स्तम्भ]

नियुद्धं मार्गगमनं गुरुप्रावरणं क्षुधः। चिन्ताव्यायामभारांश्च सेवेतामयनुक्तये ।। 5 ।। कफ के रोगों में रूक्षता करने वाले द्रव्यों द्वारा स्वेद कराना चाहिये, कफ-वात के रोगों में रूक्ष तथा स्निग्ध द्रव्यों द्वारा स्वेदन कराना चाहिये। कफ तथा मेदा से आवृत वायु में कुछ उष्ण घर, सूर्य की किरणें, नियुद्ध (कुश्ती), मार्ग में चलना, भारी वस्त्र ओढ़ना, भूख, चिन्ता, व्यायाम तथा भार उठाना-रोग से मुक्ति पाने के लिए इनका सेवन करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त विधियों से स्वेदन होता है। फलतः स्वेदसाध्य रोगों से छुटकारा मिल जाता है। मेदस्वी मनुष्य उक्त चतुर्विध स्वेद को सहन नहीं कर सकता। अतः उसे साधारण स्वेदन का विधान किया गया है।

पूर्व स्वेदनीय रोगी येषां नस्य विधातव्यं वस्तिश्चापि हि देहिनाम्। शोधनीयाश्च ये केचित् पूर्वं स्वेद्याश्च ते मताः ।। 6 ।। जिन मनुष्यों को नस्य का विधान करना हो, वस्तिकर्म करना हो अथवा जो शोधन (वमन-विरेचन) के योग्य हों, उनको पहले स्वेदन कराना उचित होता है। वक्तव्य-स्वेदन कराने के पश्चात् ही नस्य, वस्ति तथा शोधन का प्रयोग कराया जाता है।

पश्चात् स्वेदनीय रोगी पश्चात्स्वेद्या गते शल्ये मूढगर्भंगदे तथा। काले प्रजाताऽकाले वा पश्चात्स्वेद्या नितम्बिनी ।। 7 ।। निम्नलिखित रोगियों को बाद में स्वेदन कराना चाहिये-शल्य को निकाल देने के बाद उस स्थान पर, मूढगर्भ रोग में गर्भशल्य को निकाल लेने पर और समय पर प्रसव होने के बाद अथवा असमय पर प्रसव होने के बाद केवल प्रसूता स्त्री को...