भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 356 में से

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द्वितीयोऽध्यायः] स्वेदविधिः 217 वक्तव्य-काँटा निकल जाने पर वहाँ कपड़े द्वारा मुख की भाप का स्वेद दिया जाता है। प्रसव होने के बाद प्रसूता को उष्णजल से स्नान कराया जाता है तथा उसकी कमर के पास खटिया के नीचे आग रखी जाती है ये सब स्वेदन के ही प्रकार हैं। काले-अकाले-काल में अर्थात् नवें, दसवें मास में और अकाल में नवें मास के पहले जिसे गर्भस्राव या गर्भपात कहते हैं, उसमें। उभयविध स्वेदनीय रोगी स्वेद्याः पूर्वं च पश्चात् च भगन्दर्यर्शसस्तथा। अश्मर्य्यश्रातुरो जन्तुः शेषान् शास्त्रे प्रचक्ष्महे ।। 8 ।। भगन्दर, बवासीर तथा अश्मरी (पथरी) के रोगियों को चिकित्सा कर्म के पूर्व और पश्चात् भी स्वेदन कराना चाहिये। अवशिष्ट रोगियों के लिए हम शास्त्र में यथास्थान कहेंगे। वक्तव्य-उक्त 6-7-8 श्लोक सु० चि० अ० 32 से लिये गये हैं। स्वेद की व्यवस्था सर्वान् स्वेदान्निवाते च जीर्णाहारे च कारयेत्। सभी प्रकार के स्वेदों का प्रयोग निर्वात (जहाँ सीधे हवा प्रवेश न कर सकती हो ऐसे) स्थान में भोजन के पच जाने पर करना चाहिये। स्वेद का फल स्वेदाद् धातुस्थिता दोषाः स्नेहक्लिन्नस्य देहिनः ।। 9 ।। द्रवत्वं प्राप्य कोष्ठान्तर्गत्वा यान्ति विरेकताम्। स्नेहन-क्रिया द्वारा स्निग्ध शरीर वाले मनुष्यों को स्वेदन क्रिया कराने से उनकी धातुओं में रहने वाले आम आदि दोष पतले होकर तथा कोष्ठ में आकर विरेचन द्वारा बाहर निकल जाते हैं। वक्तव्य-पहले स्नेहन, फिर स्वेदन, तत्पश्चात् विरेचन कराने से आम (आँव) निकल जाता है। स्वेदन-काल में रोगी की रक्षा स्विद्यमानशरीरस्य हृदयं शीतलैः स्पृशे ।। 10 ।। स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी। जिस समय रोगी के सम्पूर्ण शरीर को स्वेदन किया जा रहा हो, उस समय उसके हृदय को शीतल द्रव्यों (वट तथा पीपल आदि के पत्तों) का स्पर्श कराना चाहिये और इस रोगी के शरीर पर स्वेदन के पूर्व) स्नेह (नारायण तैल आदि) की मालिश करा देनी चाहिये और स्वेदन के समय रोगी के नेत्रों को शीतल द्रव्यों से ढाँक देना चाहिये। वक्तव्य-विशेष विवेचन के लिए देखें-च० सू० अ० 14 श्लोक 12। स्वेद के अयोग्य रोगी अजीर्णी दुर्बलो मेही क्षतक्षीणः पिपासितः ।। 11 ।। अतिसारी रक्तपित्ती पाण्डुरोगी तथोदरी। मदार्तो गर्भिणी चैव नहि स्वेद्या विजानता ।। 12 ।। एतानपि मृदुस्वेदैः स्वेदसाध्यानुपाचरेत्। अजीर्ण (अनपच) का रोगी, दुर्बल, प्रमेह से पीड़ित, उरःक्षत से पीड़ित, क्षीण (जिसके धातुओं का क्षय हो गया हो), तृष्णा का रोगी (प्यासा), अतिसार से पीड़ित, रक्तपित्त, पाण्डु रोग तथा उदररोग के रोगी मद्य के विकारों से पीड़ित तथा गर्भवती स्त्री-इन सबकी विद्वान् चिकित्सक स्वेदन क्रिया न करें। इन रोगियों को भी यदि स्वेदसाध्य रोग हों तो मृदु (साधारण) स्वेदों द्वारा उपचार करें। वक्तव्य-यद्यपि शार्ङ्गधरसंहिता आदि ग्रन्थों के साहित्य का संग्रह अथवा सम्पादन प्राचीन संहिताग्रन्थों के सहारे ही किया गया है, तथापि सैद्धान्तिक विषयों के निर्णय के लिए आप भी उन आधारभूत ग्रन्थों का अवलोकन अवश्य कर लें, क्योंकि आपके वचनों पर समाज श्रद्धा करता है और आप पर विश्वास करता है। अतः आप कोई बात ऐसी न कह बैठें, जो शास्त्र विरुद्ध हो। इसी दृष्टि से जिन्हें अस्वेदनीय कहा गया है, उन पर भी विचार करें, क्या उक्त श्लोकों में परिगणित सभी रोगी उस योग्य हैं? मृदुस्वेद के स्थान मृदुस्वेदं प्रयुञ्जीत तथा हृन्मुष्कदृष्टिषु ।। 13 ।। हृदय, मुष्क (अण्डकोश) तथा नेत्रों पर मृदु स्वेद का प्रयोग करना चाहिये। अतिस्वेद के उपद्रव अतिस्वेदात् सन्धिपीडा दाहस्तृष्णा क्लमो भ्रमः। पित्तासृक्पिडकाकोपस्तत्र शीतैरूपाचरेत् ।। 14 ।। अधिक स्वेदन हो जाने से सन्धियों में पीड़ा, दाह, तृष्णा, सुस्ती, भ्रम (घुमटा), पित्त, रक्त का प्रकोप तथा पिड़काओं (फुन्सियों) की उत्पत्ति हो जाती है। ऐसी दशा में शीतल द्रव्यों से उपचार करना चाहिये।

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