भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 356 में से

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पृष्ठ 254

218 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे तापस्वेद-विधि तेषु तापाभिधः स्वेदो बालुकावस्त्रपाणिभिः। कपालकन्दुकाङ्गारैर्यथायोग्यं प्रयुज्यते।।15।। इन चारों प्रकार के स्वेदों में जो 'ताप' नामक स्वेद लिखा गया है, वह बालू की पोटली को गरम बनाकर, वस्त्र, हाथ, कपाल (घड़े के टुकड़ों), गेंद तथा अंगारों द्वारा आवश्यकतानुसार किया जाता है। वक्तव्य-बालू आदि को अग्नि द्वारा गर्म कर लिया जाता है और अंगारों में समीप बैठकर सेंक लिया जाता है। 'ऊष्म' नामक स्वेद निम्नलिखित विधि से प्रयुक्त करना चाहिये। ऊष्मस्वेद-विधि ऊष्मस्वेदः प्रयोक्तव्यो लोहपिण्डेष्टकाश्मभिः। प्रतप्तैरम्लसिक्तैश्च काये नक्तकवेष्टिते।।16।। अथवा वातनिर्णाशिद्रव्यक्वाथरसादिभिः। उष्णैर्घटं पूरयित्वा पार्श्वे छिद्रं विधाय च।।17।। विमुद्र्यास्यं त्रिखण्डां च धातुजां काष्ठवंशजाम्। षडङ्गुलास्यां गोपुच्छां नलीं युञ्ज्याद् द्विहस्तिकाम्।।18।। (सुखा सर्वाङ्गा ह्येषा न च क्लिश्नाति मानवम्।) सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम्।।19।। हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम्। पुरुषायाममात्रां वा भूमिमुत्कीर्य खादिरैः।।20।। काष्ठैर्दग्ध्वा तथाभ्युक्ष्य क्षीरधान्याम्लवारिभिः। वातघ्नपत्रैराच्छाद्य शयानं स्वेदयेन्नरम्।।21।। एवं माषादिभिः स्विन्नैः शयानं स्वेदमाचरेत्। 'ऊष्मस्वेद' का प्रयोग निम्नलिखित विधियों से करना चाहिये- पहली विधि-लोहपिण्ड, ईंट अथवा पत्थर को तपाकर और अम्ल द्रवों (काञ्जी आदि) से सींचकर तथा कपड़े में लपेटकर शरीर के स्वेदनीय भाग पर ऊष्म अर्थात् भाप का प्रयोग करना चाहिये। दूसरी विधि-वातनाशक द्रव्यों (एरण्ड तथा देवदारु आदि) के क्वाथ अथवा रस आदि को उष्ण करके एक घड़े भर दें और उसका मुख बन्द कर दें तथा उस घड़े के पार्श्वभाग में पहले ही एक छिद्र बनाकर उसमें ताम्र आदि धातु की, काठ की अथवा बाँस की एक नली लगा दें, इस नली के तीन भाग होने चाहिये (आवश्यकतानुसार तीन, दो अथवा एक ही खण्ड का प्रयोग किया जाता है, इसका मुख छः अंगुल (व्यास) का हो, आकृति गाय के पूँछ जैसी और लम्बाई दो हाथ होनी चाहिये। इस 'हस्तिशुण्डिका' (हाथी की सूँड जैसी) नामक नाडी (नली) द्वारा वातव्याधि से पीड़ित रोगी को स्वेदन कराना चाहिये, क्योंकि यह सुखपूर्वक प्रयुक्त की जा सकती है तथा सभी अङ्गों पर पहुँचायी जा सकती है। इससे मानव को क्लेश भी नहीं होता। इस रोगी को भली-भाँति स्नेह (तैल) की मालिश कराकर और भारी कपड़े (कम्बल या रजाई आदि) से ढाँककर सुखपूर्वक बैठा देना चाहिये। तब उक्त विधि से स्वेदन देना चाहिये। तीसरी विधि-जिसे स्वेदन कराना हो उस पुरुष की लम्बाई तथा मोटाई के समान भूमि को खोदकर उसमें खैर की लकड़ियाँ जला दें, जब लकड़ियाँ जल चुकें तो उसमें से सब कोयले निकाल दें, उसे दूध, काँजी अथवा जल से छिड़क कर और वातनाशक वृक्षों (एरण्ड आदि) के पत्रों से ढाँककर (उक्त पत्र नीचे भी बिछा दें) लेटे हुये मनुष्य को स्वेदन कराना चाहिये। चौथी विधि-उड़द आदि को उबाल कर उसे आवश्यकतानुसार फैला दें और उस पर मनुष्य को लेटाकर स्वेदन कराना चाहिये। वक्तव्य-ऊष्मा (भाप) द्वारा स्वेदन कराने के कारण ही इसे 'ऊष्मस्वेद' कहते हैं। उपनाह-स्वेद-विधि अथोपनाहस्वेदं च कुर्याद् वातहरौषधैः।।22।। प्रदिह्य देहं वातार्तं क्षीरमांसरसान्वितैः। अम्लपिष्टैः सलवणैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः।।23।। उपग्राम्यानूपमांसैर्जीवनीयगणेन च। दधिसौवीरकक्षीरैर्वारैर्वादिना तथा।।24।। कुलत्थमाषागोधूमैरतसीतिलसर्षपैः । शतपुष्पादेवदारुशेफालीस्थूलजीरकैः ।। 25।। एरण्डमूलबीजैश्च रास्नामूलकशिग्रुभिः। मिश्रिकृष्णाकुठेरैश्च लवणैरम्लसंयुतैः।।26।। प्रसारिण्यश्वगन्धाभ्यां बलाभिर्दशमूलकैः। गुडूचीवानरीबीजैर्यथालाभं समाहृतैः।।27।। क्षुण्णैः स्विन्नैश्च वस्त्रेण बद्धैः संस्वेदयेन्नरम्। महाशाल्वणसञ्ज्ञोऽयं योगः सर्वानिलार्तिहृत्।।28।। अब 'उपनाह-स्वेद' की विधि कही जाती है। वातनाशक