शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः धूमपानविधिः धूमपान-विधि धूमस्तु षड्विधः प्रोक्तः शमनो बृंहणस्तथा। रेचनः कासहा चैव वामनो व्रणधूपनः।।1।। शमनस्य तु पर्यायौ मध्यः प्रायोगिकस्तथा। बृंहणस्यापि पर्यायौ स्नेहिकौ मृदुरेव च।।2।। रेचनस्यापि पर्यायौ शोधनस्तीक्ष्ण एव च। धूम छह प्रकार का कहा गया है-1. शमन, 2. बृंहण, 3. रेचन, 4. कासहा (कासनाशक), 5. वमन (वमन कराने वाला) और 6. व्रणधूपन (घावों को धूप देना)। शमन धूम के दो नाम हैं-1. मध्यम और 2. प्रायोगिक। बृंहण-धूम के भी दो नाम हैं-1. स्नैहिक और 2 मृदु तथा रेचन के भी दो नाम हैं-1. शोधन और 2. तीक्ष्ण। धूमपान के अयोग्य व्यक्ति अधूमार्हाश्च खल्वेते श्रान्तो भीतश्च दुःखितः।।3।। दत्तवस्तिर्विरिक्तश्च रात्रौ जागरितस्तथा। पिपासितश्च दाहार्तस्तालुशोषी तथोदरी।।4।। शिरोऽभितापी तिमिरी छर्द्याध्मानप्रपीडितः। क्षतोरस्कः प्रमेहार्तः पाण्डुरोगी च गर्भिणी।।5।। रूक्षः क्षीणोऽभ्यवहृतक्षीरक्षौद्रघृतासवः। भुक्तानन्दधिमत्स्यश्च बालो वृद्धः कृशस्तथा।।6।। निम्नलिखित लोगों को 'धूम' का प्रयोग नहीं करना चाहिये-श्रान्त (थका हुआ), भीत (डरा हुआ), दुःखी (धनाशादि से दुः खित), दत्तवस्ति (जिसको वस्ति दी गयी हो), विरिक्त (जिसको विरेचन कराया गया हो), रात्रि में जागा हुआ, पिपासित (जिसको प्यास लगी हो), दाह से पीड़ित, जिसका तालु सूख रहा हो, उदररोगी, शिरोरोगी, तिमिररोगी, कै तथा अफरा से पीड़ित, जिसको उरःक्षत हो, प्रमेहरोगी, पाण्डुरोगी, गर्भवती, रूक्ष शरीर वाला, क्षीण, जिसने दूध, मधु, घी अथवा आसव (मद्य) का पान किया हो, जिसने अन्न (भात, रोटी) दही तथा मछली का भोजन किया हो, बालक, वृद्ध तथा कृश। वक्तव्य-इन लोगों को शास्त्रीय धूमों के अतिरिक्त हुक्का, सिगरेट तथा बीड़ी आदि का भी सेवन नही करने देना चाहिये। धूमपान-निषेध का कारण अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान्। (बाधिर्यमान्ध्यमूकत्वं रक्तपित्तं शिरोभ्रमम्।।7।।) तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम्। सर्पिरिक्षुरसं द्राक्षां पयो वा शर्कराम्बु वा।।8।। मधुराम्लौ रसौ वापि शमनाय प्रदापयेत्। अकाल में अथवा अधिक मात्रा में किया हुआ धूमपान- बधिरता, अन्धापन, मूकता, रक्तपित्त तथा शिरोभ्रम-इन उपद्रवों को पैदा कर देता है। इस स्थिति में (उपद्रव उत्पन्न हो जाने पर) घृतपान, स्नेहन, नस्य, अञ्जन तथा तर्पण का प्रयोग लाभदायक होता है। घृत, ईख का रस, मुनक्का, दूध, शर्कराम्बु (चीनी का शर्बत), मधुर अथवा अम्ल रस उपद्रवों की शान्ति के लिये देने चाहिये। वक्तव्य-उक्त सातवाँ श्लोक चरकसंहिता का है, किसी कारण से इसका आधा अंश छूट गया है, उसे यहाँ स्मरण कर लेना चाहिये, अन्यथा 'उपद्रवान्' का अर्थ नहीं लगाया जा सकेगा। अतः उक्त श्लोकांश के ब्रेकेट के भीतर ऊपर यथास्थान दे दिया गया है। देखें-च०सू०अ० 5.35। धूमपान की अवधि धूमस्तु द्वादशाद् वर्षाद् गृह्येताशीतिकान्न च।।9।। धूमपान बारह वर्ष के पूर्व तथा अस्सी वर्ष की वय के पश्चात् नहीं करना चाहिये।