भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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254 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे बालग्रहनाशक-धूपन अन्येऽपि धूमा गेहेषु कर्तव्या रोगशान्तये। मयूरपिच्छं निम्बस्य पत्राणि बृहतीफलम् ॥ २२ ॥ मरिचं हिङ्गु मांसी च बीज कार्पाससम्भवम्। छागरोमाहिनिर्मोकं विष्ठा बैडालिकी तथा ॥ २३ ॥ गजदन्तश्च तच्चूर्णं किञ्चिद् घृतविमिश्रितम् । गेहेषु धूपनं दत्तं सर्वान् बालग्रहाञ्जयेत् ॥ २४ ॥ पिशाचान् राक्षसाञ्जित्वा सर्वज्वरहरं भवेत्। रोगों की शान्ति के लिए और भी धूपों के प्रयोग घरों में किये जाते हैं, जिनका वर्णन यहाँ प्रस्तुत-मोर के पंख, नीम के पत्र वनभण्टा के फल, मरिच, हींग, जटामांसी, कपास के बीज (बिनौले), बकरे के रोम, साँप की केंचुली, बिल्ली की विष्ठा और हाथी के दाँत-इन सबका चूर्ण बनाकर, उसमें थोड़ा घी मिलाकर घरों में धूप दें। यह धूप सभी प्रकार के बालग्रहों को जीत लेता है। यह पिशाच और राक्षसों को जीतकर सभी प्रकार के ज्वरों को भी हरता है। वक्तव्य-हवन करना भी धूप या धूम-प्रयोग ही है। मुख द्वारा पीने योग्य धुँये को धूम तथा दूसरे को धूप कहा जाता है। यह वायु-शुद्धि का सर्वोत्तम उपाय है। भूतविद्या में भूतबाधा की शान्ति के लिए इसका पर्याप्त प्रयोग किया जाता है। पथ्य-अपथ्य आदि निर्देश परिहारस्तु धूमेषु कार्यो रेचननस्यवत् ॥ २५ ॥ नेत्राणि धातुजान्याहुर्नलवंशादिजान्यपि । इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे धूमपानविधिर्नाम नवमोऽध्यायः ॥ १ ॥ धूमों के सेवन में रेचन-नस्य के समान ही परिहार (पथ्यापथ्य) किया जाता है और धूमपान के लिये जो नेत्र या नलिकायें बनायी जाती हैं, वे धातुओं की अथवा नरसल एवं बाँस आदि की बनानी चाहिये। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का नवाँ अध्याय समाप्त ॥ ९॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA