भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः गण्डूषादिविधिः गण्डूष-कवल-विधि चतुर्विधः स्याद् गण्डूषः स्नैहिकः शमनस्तथा। शोधनो रोपणश्चैव कवलश्चापि तद्विधः ।। 1 ।। स्निग्धैस्तु स्नेहिको वाते स्वादुशीतैः प्रसादनः। पित्ते कट्वम्ललवणैरुष्णैः संशोधनः कफे ।। 2 ।। कषायतिक्तमधुरैः कदुष्णो रोपणो व्रणे। चतुष्प्रकारो गण्डूषः कवलश्चापि कीर्तितः ।। 3 ।। गण्डूष चार प्रकार का होता है- 1. स्नैहिक, 2. शमन, 3. शोधन और 4. रोपण। इसी प्रकार कवल भी चार प्रकार का होता है। स्निग्ध द्रव्यों का स्नैहिक गण्डूष होता है, वात रोगों में स्वादु (मधुर) तथा शीतल द्रव्यों का प्रसादन अर्थात् शमन गण्डूष होता है। पित्तज रोगों में कटु, अम्ल, लवण तथा उष्ण द्रव्यों का शोधन गण्डूष होता है। कफज रोगों में कषाय, तिक्त, मधुर, कुछ उष्ण द्रव्यों का रोपणगण्डूष होता है, अर्थात् जो व्रणों के घावों को भरता है। इसी प्रकार कवल भी कहा गया है। वक्तव्य-केवल द्रव्यों तथा मात्रा के भेद से गण्डूष (कुल्ला) तथा कवल (कौर या ग्रास) के चार भेद माने गये हैं। मुख के भीतरी अवयवों की चिकित्सा के ये उत्तम माध्यम हैं। गण्डूष तथा कवल में भेद असञ्चारी मुखे पूर्णे गण्डूषः कवलश्चरः। तत्र द्रवेण गण्डूषः कल्केन कवलः स्मृतः ।। 4 ।। दद्याद् द्रवेषु चूर्णं च गण्डूषे कोलमात्रकम्। कर्षप्रमाणः कल्कश्च दीयते कवले बुधैः ।। 5 ।। गण्डूष का द्रव मुख में इतना भर लिया जाता है कि वह पूर्ण रूप से घुमाया नहीं जा सकता और कवल का द्रव इतना ही डाला जाता है, जो मुख में इधर-उधर घुमाया जा सकता है। गण्डूष द्रव पदार्थों का होता है और कवल कल्क किये हुये द्रव्यों का। गण्डूष के द्रवों में यदि चूर्ण डालना हो तो एक कोल (आधा कर्ष या आधा तोला) डाला जाता है और कवल में कल्क एक तोला भर दिया जाता है। गण्डूषादि सेवन में वय का विचार धार्यन्ते पञ्चमाद् वर्षाद् गण्डूपकवलादयः। गण्डूषान् सुस्थितः कुर्यात् स्विन्नभालगलादिकः ।। 6 ।। मनुष्यस्त्रींस्तथा पञ्च सप्त वा दोषनाशनात्। कफपूर्णास्यता यावच्छेदो दोषस्य वा भवेत् ।। 7 ।। नेत्रघ्राणस्रुतिर्यावत् तावद् गण्डूषधारणम्। पाँच वर्ष की आयु के पश्चात् तथा कवल का प्रयोग करना उचित है। शिर तथा गले आदि का स्वेदन करने के पश्चात् स्वस्थ होकर गण्डूष करने चाहिये। मनुष्य तीन, पाँच, सात बार अथवा दोष का नाश होने तक गण्डूष करें। एक गण्डूष को मुख में तब तक रखना चाहिये, जब तक मुख में कफ न भर जाये अर्थात् गण्डूष के द्रव की लार बन जाये, अथवा दोष का विनाश हो जाये और आँख तथा नाक में से स्राव होने लगे, तब तक गण्डूष धारण करना चाहिये। वक्तव्य-इस श्लोक के पहले और तीसरे पाद द्वारा एक गण्डूष के धारण का काल बतलाया गया है और दूसरे पाद द्वारा गण्डूषों के प्रयोग का काल बतलाया गया है। स्नैहिक गण्डूष तिलकल्कोदकं क्षीरं स्नेहो वा स्नैहिके हितः ।। 8 ।। तिला नीलोत्पलं सर्पिः शर्करा क्षीरमेव च। सक्षौद्रो हनुवक्त्रस्थो गण्डूषो दाहनाशनः ।। 9 ।। तिलों का कल्क, जल, दूध, स्नेह, 'स्नैहिक' गण्डूष में प्रयुक्त होते हैं। इसका एक उदाहरण-तिल, नीलकमल, घृत,