शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 305, कुल 356 में से
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[शीर्षक / Header] एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 269
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
शिरोवस्ति चमड़े की होनी चाहिये, उसके दो मुख (अर्थात् दोनों ओर से खुली) हों, उसकी ऊँचाई बारह अंगुल हो और व्यास (चौड़ाई) शिर की परिधि (घेरे) के बराबर हो। इसको शिर पर बाँधकर और उड़द की पीठी से सन्धिरोध करके कोष्ण (गुनगुने) स्नेहों (उपयुक्त तैल आदि) से भर दें। इसको तब तक धारण करें, जब तक नाक, नेत्र तथा मुख से जल का स्राव न होने लगे और जब तक वेदना शान्त न हो जाये अथवा एक हजार मात्रा परिमित समय (लगभग 30 मिनट) तक। भोजन किये बिना (प्रातःकाल) शिरोवस्ति का प्रयोग करना चाहिये। **वक्तव्य—**कुछ प्रतियों में 'नासाकर्णमुखस्रुतिः' पाठ है। शिरोवस्ति के प्रयोग से कर्णस्राव से पहले नेत्रस्राव होते देखा जाता है।
शिरोवस्ति प्रयोगकाल प्रयोज्यस्तु शिरोवस्तिः पञ्चसप्ताहमेव वा। विमोच्य शिरसो वस्तिं गृह्णीयाच्च समन्ततः ।। 126 ।। ऊर्ध्वकायं ततः कोष्णानीरैः स्नानं च कारयेत्। अनेन दुर्जया रोगा वातजा यान्ति सङ्क्षयम् ।। 127 ।। शिरःकम्पाद्यस्तेन सर्वकालेषु युज्यते। पाँच अथवा सात दिन तक प्रतिदिन एक बार उक्त विधि से शिरोवस्ति का प्रयोग करना चाहिये। शिर से वस्ति को हटाकर (पहले तेल को सम्भाल कर ग्रहण कर लेना चाहिये) चारों ओर से शिर को मलना चाहिये और इसके पश्चात् गुनगुने जल से स्नान करा देना चाहिये। इस प्रकार वस्ति के सेवन से शिरःकम्प आदि दुःसाध्य वातरोग नष्ट हो जाते हैं। इसलिये सभी समयों (ऋतुओं) में इसका प्रयोग किया जा सकता है। **वक्तव्य—**ऊँचे किनारे वाली तथा छतरहित चमड़े या गत्ते की टोपी बनवाकर शिर पर बाँध दी जाती है और उसमें उपयुक्त स्नेह भर दिया जाता है। इसी का नाम 'शिरोवस्ति' है।
कर्णपूरण-विधि स्वेदयेत् कर्णदेशं तु किञ्चिन्नुः पार्श्वशायिनः ।। 128 ।। मूत्रैः स्नेहै रसैः कोष्णैस्ततः श्रोत्रं प्रपूरयेत्। कर्णं च पूरितं रक्षेच्छतं पञ्च शतानि वा ।। 129 ।। सहस्त्रं वापि मात्राणां श्रोत्रकण्ठशिरोगदे। मनुष्य को पार्श्व के बल लेटाकर उसके कान तथा
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
उसके आस-पास थोड़ा स्वेदन करे तत्पश्चात् मूत्र (अजामूत्र आदि) स्नेह (तेल आदि) तथा आक आदि के पत्तों के रस को कुछ गर्म कर उससे कान को भर दें। कान के रोगों में एक सौ मात्रा (लगभग 3 मिनट), कण्ठ के रोगों में पाँच सौ मात्रा (लगभग 15 मिनट), तथा शिर के रोगों में एक सहस्र मात्रा (लगभग 30 मिनट) तक कान को भरा रखना चाहिये, अर्थात् उसी प्रकार पड़े रहना चाहिये। **वक्तव्य—**शार्ङ्गधरसंहिता के कुछ संस्करणों में मात्राकाल परिचायक एक पद्य यहाँ भी किया गया है। वास्तव में इस श्लोक की व्याख्या शा० सं० उ० खं० अ० 5 श्लोक 28 में की जा चुकी है, अतः उसे यहाँ स्थान नहीं दिया गया है।
रसपूरण का समय रसाद्यैः पूरणं कर्णे भोजनात् प्राक्प्रशस्यते ।। 130 ।। तैलाद्यैः पूरणं कर्णे भास्करेऽस्तमुपागते। भोजन के पूर्व (प्रातःकाल) कान में रस आदि भरना प्रशस्त है और तेल आदि सूर्य के अस्त हो जाने पर (रात्रि में) भरना चाहिये।
कर्णरोगहर योग (1) पीतार्कपत्रमाज्येन लिप्तं वह्नौ प्रतापयेत् ।। 131 ।। तद्रसः श्रवणे क्षिप्तः कर्णशूलहरः परः। आक के पीले पत्ते को घी लगाकर आग पर गर्म करें, फिर इसका रस निचोड़ कर कान में डाल दें। इससे कान का शूल अवश्य नष्ट हो जाता है।
कर्णरोगहर योग (2) कर्णशूलातुरे कोष्णं बस्तमूत्रं ससैन्धवम् ।। 132 ।। निक्षिपेत् तेन शाम्यन्ति शूलपाकादिका रुजः। कर्णशूल से पीड़ित रोगी के कान में थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर बकरे का मूत्र गर्म करके डाल दें। इससे शूल तथा पाक (पीब जाना) आदि रोग शान्त हो जाते हैं।
कर्णरोगहर योग (3) शृङ्गबेरं च मधुकं मधु सैन्धवमामलम् ।। 133 ।। तिलपर्णीरसस्तैलं टङ्कणं निम्बुकद्रवम्। कदुष्णं कर्णयोर्देयमेतद् वा वेदनापहम् ।। 134 ।। अदरक, मुलेठी, मधु, सेंधा नमक, आँवला, तिलपर्ण, का रस, तेल, टंकण तथा नींबू का रस इन सब द्रव्यों का घोल तैयार कर तथा उसे गर्म कर कान में डालना चाहिये यह भी वेदना (शूल) को नष्ट करता है।