भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

Here is the precise, line-by-line transcription of the Sanskrit and Hindi text from the image:

270 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे कर्णरोगहर योग (4) कलित्थमातुलुङ्गाम्लशृङ्गबेररसैः शुभैः। सुखोष्णैः पूरयेत् कर्णं कर्णशूलोपशान्तये ।। 135 ।। कैथ, बिजौरा, नींबू, अम्लवेतस तथा अदरक का रस निकाल लें। इस रस को दुहरे-चोहरे वस्त्र से छानकर और गर्मकर कान में भर दें। इससे भी कर्णशूल शान्त हो जाता है। कर्णरोगहर योग (5) अर्काङ्कुरानम्लपिष्टांस्तैलाक्तांल्लवणान्वितान्। सन्निदध्यात् स्नुहीकाण्डे कोरिते तच्छदावृते ।। 136 ।। पुटपाकक्रमं कृत्वा रसस्तच्च प्रपूरयेत्। सुखोष्णैस्तेन शाम्यन्ति कर्णपीडाः सुदारुणाः ।। 137 ।। आक के अंकुरों (कोपलों) को काँजी में पीस लें, फिर इसमें थोड़ा तैल तथा नमक डालकर कल्क बना लें, फिर सेहुण्ड के दण्ड को भीतर से छालकर उसमें उक्त कल्क को भर दें जर उसे सेहुण्ड (थूहर) के पत्तों से बन्द कर दें। फिर इसको पुटपाक की विधि से पकाकर रस निकाल लें और इस रस को कुछ गर्मकर कान में डाल दें। इससे भीषण कर्णशूल भी शान्त हो जाते हैं। वक्तव्य-पुटपाक-विधि के लिए देखें-शा० सं०, म० खं० अ० 1, श्लोक 21-23। कर्णशूल में दीपिका तैल महतः पञ्चमूलस्य काण्डान्यष्टाङ्गलानि च। क्षौमेणावेष्ट्य संसिच्य तैलेनादीपयेत् ततः ।। 138 ।। यत्तैलं च्यवते तेभ्यः सुखोष्णं तेन पूरयेत्। ज्ञेयं तद्दीपितैलं सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ।। 139 ।। एवं स्याद् दीपिकातैलं कुष्ठे देवतरौ तथा। बृहत्पञ्चमूल (बिल्व, अरणी, सोनापाठा, पाढ़ल तथा गम्भार) की आठ आठ अंगुल लम्बी लकड़ियों को रेशमी कपड़े से लपेट कर और तिलतेल में भिगोकर चिमटे से पकड़कर जला दें। इन काष्ठों के जलते समय उनसे जो तेल टपकता है, उसका नाम 'दीपिका तेल' है। इस तेल को गर्म-गर्म कान में डालना चाहिये। यह त्रिदोषज वेदना को बहुत शीघ्र रोकता है। इसी विधि से कूठ तथा देवदारु के कल्क एवं क्वाथ से भी 'दीपिका तैल' बनाया जाता है। श्योनाक तैल तैलं श्योनाकमूलेन मन्देऽग्नौ परिपाचितम् ।। 140 ।। हरेदाशु त्रिदोषोत्थं कर्णशूलं प्रपूरणात्। सोनापाठा की जड़ का कल्क एक पाव और तिलतेल एक सेर दोनों को मिलाकर धीमी आँच पर विधिपूर्वक पकायें। यह तेल कान में भरने (डालने) से त्रिदोषज कर्णशूल को नष्ट करता है। शूकरवसा योग कल्कक्वाथेन यष्ट्याह्वकाकोलीमाषधान्यकैः ।। 141 ।। शूकरस्य वसां पक्त्वा कर्णनादार्तिनाशिनी। मुलेठी, काकोली (अभाव में अश्वगन्धा), उड़द तथा धनियाँ के क्वाथ तथा कल्क के साथ सूअर की चर्बी पकायें। इससे कर्णनाद (कान में विविध प्रकार की ध्वनियाँ होना) तथा कर्णशूल नष्ट हो जाता है। स्वर्जिका तैल स्वर्जिका मूलकं शुष्कं हिङ्गु कृष्णासमन्वितम् ।। 142 ।। शतपुष्पा च तैस्तैलं पक्वं सूक्तचतुर्गुणम्। प्रणादं शूलबाधिर्यं स्रावं कर्णस्य नाशयेत् ।। 143 ।। सज्जीखार, सूखी मूली, हींग, पीपल तथो सौंफ इनका कल्क बनाकर कल्क से चौगुना तेल तथा तैल से चौगुनी काञ्जी इन सभी को मिलाकर विधिपूर्वक तेल का पाक करें। यह तेल कर्णनाद, कर्णशूल, बाधिर्य (बहरापन) तथा कर्णस्राव को नष्ट करता है। अपामार्ग तैल अपामार्गक्षारजले तत् क्षारं कल्कितं क्षिपेत्। तेन पक्वं जयेत् तैलं बाधिर्यं कर्णनादकम् ।। 144 ।। अपामार्ग के क्षार के जल से अपामार्ग के क्षार का कल्क बनायें, फिर इससे तेल का पाक करें। तह तेल बाधिर्य तथा कर्णनाद को नष्ट करता है। शम्बू क तैल शम्बूकस्य तु मांसेन पचेत् तैलं तु सार्षपम्। तस्य पूरणमात्रेण कर्णनाडी प्रशाम्यति ।। 145 ।। शम्बूक (घोंघा या शंख) के कीड़ों के कल्क से सरसों का तैल पकायें। इसे कान में डालने मात्र से कर्णनाड़ी (कर्णस्राव या कान का नासूर) शान्त हो जाती है। कर्णस्रावहर योग चूर्णं पञ्चकषायाणां कपित्थरसमेव च। कर्णस्रावे प्रशंसन्ति पूरणं मधुना सह ।। 146 ।। तिन्दुकान्यभया लोध्रः समङ्गा चामलक्यपि। ज्ञेयाः पञ्च कषायास्तु कर्णयोरस्मिन् भिषग्वरैः ।। 147 ।।