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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 271

पञ्चकषाय द्रव्यों का चूर्ण, कैथ का रस तथा मधु इन सभी को मिलाकर कान में डालने से कणस्राव शान्त हो जाता है। इस कार्य के लिए निम्नलिखित पाँच द्रव्य 'पञ्चकषाय' कहे जाते हैं-1 तेन्दू, 2. हरड़, 3. लोध, मजीठ और 5. आँवला।

स्वर्जिका योग स्वर्जिकाचूर्णसंयुक्तं बीजपूररसं क्षिपेत्। कर्णस्रावरुजादाहाः प्रणश्यन्ति न संशय ।। 148 ।। सज्जीखार का चूर्ण बिजौरा के रस में मिलाकर कान में डालने से कान का स्राव, पीड़ा तथा दाह शान्त हो जाते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।

आम्रादि तैल आम्रजम्बूप्रवालानि मधूकस्य वटस्य च। एभिः संसाधितं तैलं पूतिकर्णोपशान्तिकृत् ।। 149 ।। आम, जामुन, महुआ तथा बरगद इनके प्रवालों (कोमल पत्तों) का कल्क डालकर सिद्ध किया हुआ तेल पूतिकर्ण (कान में से दुर्गन्धित पीब का निकलना) नामक रोग को शान्त कर देता है।

कर्णकीटहर योग ( 1 ) पूरणं हरितालेन गवां मूत्रयुतेन च। अथवा सार्षपं तैलं कर्णकीटहरं परम् ।। 150 ।। हरिताल को गोमूत्र में पीसकर अथवा केवल सरसों का तैल कान में डालने से कान के क्रिमि नष्ट हो जाते हैं।

कर्णकीटहर योग ( 2 ) स्वरसं शिग्रुमूलस्य सूर्यावर्तकसं तथा। त्र्यूषणं चूर्णितं चैव कपिकच्छूटारसम् ।। 151 ।। कृत्वैकत्र क्षिपेत् कर्णे कर्णकीटहरं परम्। (धूपनं कर्णदौर्गन्ध्ये गुग्गुलः श्रेष्ठ उच्यते ।। 152 ।। )

इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायामुत्तरखण्डे लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिर्नामाैकादशोऽध्यायः ।। 11 ।।

सहिजन की जड़ का रस, सूर्यावर्त (हुलहुल) का रस, त्रिकटु का चूर्ण तथा किवाँच की जड़ का रस इन सबको एक साथ मिलाकर कान में डालने से कृमि नष्ट हो जाते हैं। कान से दुर्गन्धि आने पर गुग्गुलु की धूप देना उत्तम होता है।

वक्तव्य-उक्त दो योग कान में उत्पन्न हुये क्रिमियों को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं। यदि बाहर से कोई क्रिमि कान में चला जाये तो केवल जल से कान को भर देना चाहिये। इससे क्रिमि शीघ्र ही बाहर निकल आता है फिर कान में भरे हुये उस जल के गर्दन टेढ़ी करके गिरा दें और उसे रुई के फाहे से पोंछ दें। प्रायः देखा गया है कि आजकल आयुर्वेदीय पद्धति से चिकित्सा करने वाले चिकित्सक आँख, कान, नाक तथा गला आदि के रोगों की उपेक्षा किये रहते हैं। यह प्रवृत्ति आयुर्वेद के लिए अपमानजनक है। आप ध्यान दें, आयुर्वेद में उक्त अवयवों में होने वाले रोगों की अचूक चिकित्सायें भरी पड़ी हैं, आवश्यकता है केवल भारतीय हृदय से अपने आयुर्वेदीय साहित्य का पर्यवेक्षण करने की, और उसके सही उपादानों को लेकर उन-उन योगों के विधिवत् निर्माण-प्रयोग तथा उसके प्रतिफल को धैर्यपूर्वक देखने एवं सुनने की। फिर आप देखेंगे कि धन और सुयश आपके कदम चूमा करेंगे।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।। 11 ।।

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