शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 283 [ बायाँ स्तम्भ ] कृष्णालोहरजस्ताम्रशङ्खविद्रुमसिन्धुजैः । समुद्रफेनकासीसस्रोतोजदधिमस्तुभिः ॥५९॥ लेखनो वाक्शतं धार्यस्तस्यैतावद् विधारणम्। स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तकद्रव्यपाचितः ॥६०॥ लेखनात् त्रिगुणो धार्यः पुटपाकस्तु रोपणः। वितरेत् तर्पणोक्तां तु क्रियां व्यापत्तिदर्शने॥६१॥ घी, मांस, वसा, मज्जा, मेदा तथा मधुर द्रव्यों (शतावरी तथा मुलेठी आदि) का पुटपाक 'स्नेहन' होता है और वह दो सौ वाक्मात्रा (7-8 मिनट) तक धारण करना चाहिये। जंगल (मरुस्थल के) प्राणियों के यकृत्, मांस तथा लेखन द्रव्यों का पुटपाक लेखन होता है। उसको सौ मात्रा (3-4 मिनट) तक धारण करें। लेखन द्रव्य ये हैं-लोहचूर्ण, ताम्रचूर्ण (अथवा भस्म), शंख, प्रवाल, सेंधा नमक, समुद्रफेन, कासासी, काला सुरमा तथा दही का पानी, स्त्री का दूध जंगली जीवों का मांस, मधु, घी तथा तिक्त द्रव्यों (निम्बपत्रादि) का पुटपाक रोपण होता है। इसकी तीन सौ मात्रा (10-12 मिनट) तक धारण करें। यदि इसके अतियोग अथवा हीन योग से कोई हानि दिखलायी दे तो तर्पणोक्त विधि से चिकित्सा करें। वक्तव्य-उपर्युक्त उपयोगी द्रव्यों का पुटपाक विधि से पाक करके उनका रस निकाल लेते हैं और उस रस का प्रयोग नेत्रों में किया जाता है। अञ्जन-विधि अथ सम्पक्वदोषस्य प्राप्तमञ्जनमाचरेत्। हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽञ्जनमिष्यते ॥६२॥ पूर्वाह्ने चापराह्ने च ग्रीष्मे शरदि चेष्यते। वर्षासु नाभ्रे नात्युष्णे वसन्ते च सदैव हि॥६३॥ दोषों का पाक हो जाने पर आवश्यकतानुसार 'अञ्जन' का प्रयोग करें। हेमन्त ऋतु (माघ तथा फाल्गुन) में दिन के मध्य भाग (दोपहर) में अञ्जन लगाना चाहिये और शरद् ऋतु (आश्विन तथा कार्तिक) तथा ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ तथा आषाढ़) में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में अञ्जन लगाना चाहिये। वर्षा ऋतु (सावन तथा भादों) में जब बादल तथा अत्यन्त गर्मी न हो तब अञ्जन लगायें और वसन्त ऋतु (चैत्र तथा वैशाख) में किसी भी समय अञ्जन लगाया जा सकता है। वक्तव्य-नेत्रों में होने वाले दोषपाक का लक्षण- 'मन्दवेदनता कण्डूः संरम्भाश्रुप्रशान्तता। प्रशस्तवर्णता चाक्ष्णोः सम्पक्वं दोषमादिशेत्'। जब तक ये लक्षण दिखलायी न दें तब तक अञ्जन लगाना उचित नहीं है। [ दायाँ स्तम्भ ] अञ्जन के भेद लेखनं रोपणं चैव तथा स्यात् स्नेहाञ्जनम्। लेखनं क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरञ्जनमिष्यते॥६४॥ कषायतिक्तरसयुक् सस्नेहं रोपणं मतम्। मधुरं स्नेहसम्पन्नमञ्जनं च प्रसादनम्॥६५॥ अञ्जन तीन प्रकार का होता है-1. लेखन, 2. रोपण तथा 3. स्नेहन। क्षार (जौखार आदि), तीक्ष्ण (कटु द्रव्य) तथा अम्ल रस युक्त द्रव्यों का अञ्जन 'लेखन' माना जाता है, कषाय तथा तिक्त रस से युक्त द्रव्यों का स्नेहयुक्त अञ्जन 'रोपण' माना जाता है और मधुर द्रव्यों का स्नेह युक्त अञ्जन 'प्रसादन' अर्थात् स्नेहन होता है। अञ्जन के अन्य तीन भेद गुटिकासच्चूर्णानि त्रिविधान्यञ्जनानि च। कुर्याच्छलाकयाऽङ्गुल्या हीनानि च यथोत्तरम्॥६६॥ अञ्जन के तीन प्रकार और होते हैं। यथा-1. गुटिका (लम्बी-लम्बी गोलियां जैसे चन्द्रोदयावर्ति), 2. रस (द्रवस्वरूप) और 3. चूर्ण। ये यथासम्भव सलाई अथवा अंगुली से लगाये जाते हैं। गुटिका घिसकर लगायी जाती है। ये उत्तरोत्तर हीनगुण वाले होते हैं। अञ्जन का निषेध श्रान्ते प्ररुदिते भीते पीतमद्ये नवज्वरे। अजीर्णे वेगघाते च नाञ्जनं सम्प्रशस्यते॥६७॥ श्रान्त (थका हुआ), प्ररुदित (रोया हुआ) भीत (डरा हुआ) तथा पीतमद्य (मद्य पिया हुआ) मनुष्य और नवज्वर में, अजीर्ण से तथा वेगरोध से पीड़ित मनुष्य अञ्जन न लगायें। गुटिकाञ्जन की मात्रा हरेणुमात्रां कुर्वीत वर्तिं तीक्ष्णाञ्जने भिषक्। प्रमाणं मध्यमेऽध्यर्धं द्विगुणं तु मृदौ भवेत्॥६८॥ चिकित्सक का कर्तव्य है, कि तीक्ष्ण द्रव्यों से निर्मित गुटिकाञ्जन की वर्ति (बत्ती), हरेणु (मटर) के समान बनाये और मध्यम (रोपण द्रव्य निर्मित गुटिकाञ्जन) में डेढ़ हरेणु के समान और मृदु (स्नेहन) में दो हरेणु के समान बत्ती बनायें। रसरूप अञ्जन की मात्रा रसक्रिया तूत्तमा स्यात् त्रिविडङ्गमिता हिता। मध्यमा द्विविडङ्गा स्याद्धीना त्वेकविडङ्गिका॥६९॥ रसरूप अञ्जन की उत्तम मात्रा वायविडिंग के तीन दानों के बराबर मध्यम दो वायविडिंग और हीन मात्रा एक वायविडिंग के बराबर होनी चाहिये।