भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

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284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे चूर्णरूप अञ्जन की मात्रा वैरेचनिकचूर्णं तु द्विशलाकं विधीयते। मृदौ तु त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहिकेऽञ्जने।।70।। विरेचन (लेखन) चूर्णाञ्जन की मात्रा दो सलाई भर, मृदु (रोपण) की तीन सलाई तथा स्नेहन की चार सलाई भर मात्रा मानी जाता है। वक्तव्य—सुरमे की शीशी में सलाई को डालने पर उसके एक अंगुल अग्रभाग पर जितना सुरमा लग जाता है, वह मात्रा एक शलाका कही जाता है। शलाका-निर्माण-विधि मुखयोः कुण्ठिता श्लक्ष्णा शलाकाष्टाङ्गुलोन्मिता। अश्मजा धातुजा वा स्यात् कलायपरिमण्डला।।71।। ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता। सुवर्णरजतोट्भूता शलाका स्नेहने मता।।72।। अङ्गुलीव मृदुत्वेन कथिता रोपणे बुधैः। अञ्जन (सुरमा) लगाने की 'शलाका' (सलाई) आठ अंगुल लम्बी हो, दोनों ओर से कुण्ठित (गोलाईदार हो), श्लक्ष्ण (खुरदरी न हो), उसके दोनों मुख मटर के समान मोटे हों तथा वह पत्थर तथा स्वर्ण आदि धातु की बनानी चाहिये। लेखन-अञ्जन के लिए ताँबा, लोहा तथा पत्थर की, स्नेहन अञ्जन के लिए सोना तथा चाँदी को शलाका होनी चाहिये और रोपण अञ्जन में मृदु होने के कारण अंगुली को ही उत्तम माना जाता है। वक्तव्य—यषद (जस्ता) का शलाका उत्तम होती है। आचार्य शार्ङ्गधर ने इसी प्रकरण में आगे शलाका बनाने की विधि भी कही है। अञ्जन प्रयोग विधि एवं काल सायं प्रातर्वाञ्जनं स्यात् तत्सदा नैव कारयेत्।।73।। नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां सम्प्रशस्यते। कृष्णभागादधः कुर्यादपाङ्गं यावदञ्जनम्।।74।। अञ्जन सायंकाल अथवा प्रातःकाल लगाना चाहिये। इसके अतिरिक्त समयों में अञ्जन लगाना उचित नहीं है। अत्यन्त शतिकाल में, अत्यन्त उष्णकाल में, प्रवात (जब अत्यन्त हवा चलती हो) में तथा अभ्रकाल (जब आकाश में बादल छाये हों) में अञ्जन नहीं लगाना चाहिये। कृष्ण-भाग के नीचे तथा अपाङ्ग (नेत्र के बाहरी कोण) तक अञ्जन लगाना चाहिये। वक्तव्य—अञ्जन लगाने का समुचित विधि के लिए देखें-सु० उ० अ० 18 श्लो० 64-65। इन श्लोकों का तात्पर्य यह है, कि कोया से लेकर अपांग (आँख के कोने) तक अञ्जन लगी हुई। शलाका को आँख के भीतर डालकर घुमा लेना चाहिये। चन्द्रोदयावर्ति शङ्खनाभिर्विभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला। पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम्।।75।। छागीक्षीरेण सम्पेष्य वर्तिं कृत्वा यवोन्मिताम्। हरेणुमात्रां सङ्घृष्य जलैः कुर्यात्तथाञ्जनम्।।76।। तिमिरं मांसवृद्धिं च काचं पटलमर्बुदम्। रात्र्यन्ध्यं वार्षिकं पुष्पं वर्तिश्चन्द्रोदया जयेत्।।77।। शंखनाभि, बहेड़ा की मींगी, बड़ी हरड़, मैनसिल, पीपल, मरिच, कूठ तथा वच इन सब द्रव्यों को समान भाग लेकर अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण बनाये और फिर उसको बकरी के दूध में भली-भाँति पीसकर जौ जैसप लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बना लें और हरेणु परिमित औषधि जल के साथ घिसकर अञ्जन करें। यह तिमिर (धुन्ध), मांसवृद्धि (अर्म आदि), काच (मोतिया), पटलगत दोष, अर्बुद (नेत्रार्बुद), रतौंधी तथा वर्ष भर के पुष्प (फूलों) को जीतता है। वक्तव्य—उक्त योग में विचारणीय विषय यह है, कि जौ भर की तो बत्ती बनाने का विधान है और हरेणु भर औषध लगाने का ? हरेणु नाम मटर का है तदनुसार सुश्रुत के भाष्यकार डल्हणाचार्य तथा शार्ङ्गधर के टीकाकार श्रीआढमल्ल ने उसका अर्थ भी किया है। हमारा विचार है कि 'हरेणु' के पर्यायों में बड़ा चना, मटर, पित्तपापड़ा तथा हरेणुका भी देखे जाते हैं। अतः यथोचित निर्णय लेकर मात्रा का विधान करें। करञ्जवर्ति पलाशपुष्पस्वरसैर्बहुशः परिभाविता। करञ्जबीजवर्तिस्तु दृष्टेः पुष्पं विनाशयेत्।।78।। करञ्ज के बीजों का कपड़छन चूर्ण बनाकर उसको पलाश के फूलों के स्वरस का अनेक (सात) भावनायें दें, फिर इसकी वर्ति बना लें। यह भी फूली को नष्ट करती है। समुद्रफेनादिवर्ति समुद्रफेनसिन्धूत्थशङ्खदक्षाण्डवल्कलैः । शिग्रुबीजयुतैर्वर्तिः शुक्रादींश्छत्रवल्लिखेत्।।79।। समुद्रफेन, सेंधा नमक, शंख, मुरगी के अण्डों के छिलके

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