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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

[त्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 285

[बायाँ स्तम्भ]

और सहजन के बीज-इन सभी द्रव्यों को पीसकर (सहजन के रस से) वर्ति बनायें। यह भी शुक्रादि नेत्ररोगों को शस्त्र के समान काट देती है।

दन्तवर्ति दन्तैर्दन्तिवराहोष्ट्रगोहयाजखुरोद्भवैः । शङ्खमुक्ताम्भोधिफेनयुतैः सर्वैर्विचूर्णितैः ।। 80 ।। दन्तवर्तिः कृता श्लक्ष्णा शुक्राणां नाशिनी परा। हाथी, सूअर, ऊँट, गाय, घोड़ा, बकरी, तथा गधा इनके दाँत, शंख, मोती तथा समुद्री झाग इन सब द्रव्यों को समभाग लेकर और अत्यन्त बारीक पीसकर (किसी भी उपयुक्त द्रव से) वर्ति बना लें। यह भी शुक्र नामक नेत्ररोगों को नष्ट करती है।

नीलोत्पलवर्ति नीलोत्पलं शिग्रुबीजं नागकेशरकं तथा ।। 81 ।। एतत्कल्कैः कृता वर्तिरतितन्द्रां निवारयेत्। नीलकमल, सहजन के बीज तथा नागकेसर इन सबको पीसकर वर्ति बनायें। यह अतिनिन्द्रा को रोकती है।

कुसुमिकावर्ति तिलपुष्पाण्यशीतिः स्युः षष्टिः पिप्पलतण्डुलाः ।। 82 ।। जातीकुसुमपञ्चाशन्मरिचानि च षोडश। सूक्ष्मं पिष्ट्वा जले वर्तिः कृता कुसुमिकाभिधा ।। 83 ।। तिमिरार्जुनशुक्राणां नाशिनी मांसवृद्धिहृत्। ( एतस्याश्चाञ्जने मात्रा प्रोक्ता सार्धहरेणुका ।। 84 ।।) तिल के फूल 80, पीपल के चावल (जो उसे कूटने पर मिलते हैं) 60, चमेली के फूल 50 और कालीमरिच 16 दाना इन सबको बारीक पीसकर जल से बत्ती बनाये। इसका नाम 'कुसुमिकावर्ति' है। यह तिमिर, अर्जुन तथा शुक्र नामक नेत्र रोगों का नाश करती है और मांसवृद्धि को हरती है। इसकी मात्रा अञ्जन करने में डेढ़ हरेणु भर का कही गयी है।

रसाञ्जनवर्ति रसाञ्जनं हरिद्रे द्वे मालतीनिम्बपल्लवाः। गोशकृद्रससंयुक्ता वर्तिर्नक्तान्ध्यनाशिनी ।। 85 ।। रसवत, हल्दी, दारुहल्दी, चमेली और नीम के पत्ते-इन सबको अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर गाय के गोबर के रस से वर्ति बनाये। यह रतौंधी को नष्ट करती है।

धात्र्यादिवर्ति धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च।


[दायाँ स्तम्भ]

पिष्ट्वा वर्तिं जलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।। 86 ।। नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा। आँवला के बीज एक भाग, बहेड़ा के बीज दो भाग और हरड़ के बीजों की गिरी तीन भाग लेकर और भली-भाँति पीसकर जल से वर्ति बना लें। इसका दो हरेणु भर अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव (उलका) तथा वातरक्त की पीड़ा को शीघ्र ही हरती है।

वक्तव्य-उक्त सभी उदाहरण वर्ति स्वरूप गुटिकाञ्जन के हैं। अब इसके आगे रस रूप में प्रयुक्त होने वाले अञ्जनों के उदाहरण कहे जायेंगे।

तुत्थादि-रसक्रिया तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थं सिताशङ्खमनःशिला ।। 87 ।। गैरिकोदधिफेनं च मरिचं चेति चूर्णयेत्। संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् ।। 88 ।। वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्रहरां पराम्। शुद्ध तूतिया, सुवर्णमाक्षिक, सेंधा नमक, खाँड, शंख, मैनसिल, गेरू, समुद्रफेन तथा मरिच इन सबको अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर और मधु के साथ मिलाकर रस रूप अञ्जन बना लें। यह वर्त्मरोग (रोहा आदि), अर्म, तिमिर, काच (मोतिया) तथा शुक्र नामक नेत्ररोग का विनाश करने के लिए उत्तम योग है।

वटक्षीर-रसाञ्जन वटक्षीरेण संयुक्तो मुख्यः कर्पूरजः कणः ।। 89 ।। क्षिप्रमञ्जनतो हन्ति कुसुमं तु द्विमासिकम्। शुद्ध कपूर को बरगद के दूध में पीसकर अञ्जन करने से दो महीने का पुराना फूला भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।

अतिनिद्रानाशक योग क्षौद्राश्वलालासङ्घृष्टैर्मरिचैर्नेत्रमञ्जयेत् ।। 90 ।। अतिनिद्रा शमं याति तमः सूर्योदयादिव। कालीमरिच को मधु तथा घोड़े की लार में घिसकर नेत्र में अञ्जन करें। इससे अतिनिद्रा उस प्रकार शान्त हो जाती है जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अन्धकार।

तन्द्रानाशक योग जातीपुष्पं प्रवालं च मरिचं कटुकी वचा ।। 91 ।। सैन्धवं बस्तमूत्रेण पिष्टं तन्द्राघ्नमञ्जनम्। चमेली के फूल तथा पत्ते, मरिच, कुटकी, वच तथा