शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 322, कुल 356 में से
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सेंधा नमक इन सबको समभाग लेकर और बकरे के मूत्र में पीसकर अञ्जन लगाने से तन्द्रा (उँघाई) नष्ट हो जाती है।
प्रबोधाञ्जन शिरीषबीजगोमूत्रकृष्णामरिचसैन्धवैः ॥ ९२॥ अञ्जनं स्यात् प्रबोधाय सरसोनशिलावचैः।
सिरस (शिरशि) के बीज, पीपल, मरिच, सेंधा नमक, लहसुन, मैनसिल तथा वच इन सबको समान भाग लेकर गोमूत्र में पीसकर अञ्जन लगाने से मूर्च्छित रोगी संज्ञावान् (चैतन्य) हो जाता है।
दार्व्यादि रसक्रिया दार्वा पटोलं मधुकं सन्निम्बपद्मकोत्पलम् ॥ ९३॥ प्रपौण्डरीकं चैतानि पचेत् तोये चतुर्गुणे। विपाच्य पादशेषं तु शृतं नीत्वा पुनः पचेत् ॥ ९४॥ शीते तस्मिन्मधु सितां दद्यात् पादांशिकां नरः। रसक्रियैषा दाहाश्रुरक्तरागरुजो हरेत् ॥ ९५॥
दारुहल्दी, परवल की पत्ती, मुलेठी, नीम के पत्ते, पद्मकाठ, लाल कमल तथा सफेद कमल इन सब द्रव्यों को कूटकर चौगुने जल में पकायें, चतुर्थांश जल शेष रह जाने पर छान लें। इस क्वाथ को फिर पकायें जब गाढ़ा हो जाये तो उतार लें। शीतल हो जाने पर उसमें मधु तथा खाँड (क्वाथ्य द्रव्यों के) चतुर्थांश मिला दें। यह रसक्रिया दाह, आँसू तथा पीड़ा को हरती है।
रसाञ्जनादि रसक्रिया रसाञ्जनं सर्जरसो जातीपुष्पं मनःशिला। समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचानि च॥ ९६॥ एतत् समांशं मधुना पिष्ट्वा प्रक्लिन्नवर्त्मनि। अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणां च प्ररोहणम् ॥ ९७॥
रसवत, राल, चमेली के फूल, मैनसिल, समुद्रफेन, सेंधा नमक, गेरू तथा मरिच इन सब द्रव्यों को समभाग लेकर सूक्ष्म पीसकर तथा मधु मिलाकर अञ्जन करें। इससे प्रक्लिन्न- वर्त्म रोग, क्लेद तथा कण्डू (खुजली) का नाश हो जाता है। पक्ष्मों (आँख के बालों) का पुनः प्ररोहण (उत्पन्न) हो जाता है।
गुडूची रसक्रिया गुडूचीस्वरसः कर्षः क्षौद्रं स्यान्माषकोन्मितम्। सैन्धवं क्षौद्रतुल्यं स्यात् सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ९८॥ अञ्जयेन्नयनं तेन पिल्लार्मतिमिरं जयेत्। काचं कण्डूं लिङ्गनाशं शुक्लकृष्णगतान् गदान्॥ ९९॥
गिलोय का स्वरस एक कर्ष (1 तोला), मधु और सेंधा नमक एक-एक माशा सबको एक साथ पीसकर उसको नेत्रों में लगायें। यह पिल्ल, अर्म, तिमिर, काच, कण्डू, लिंगनाश तथा शुक्ल भाग तथा कृष्ण भाग के नेत्र रोगों को जीतता है।
पुनर्नवा रसाञ्जन दुग्धेन कण्डूं क्षौद्रेण नेत्रस्त्रावं च सर्पिषा। पुष्पं तैलेन तिमिरं काञ्जिकेन निशान्धताम् ॥ १००॥ पुनर्नवा जयेदाशु भास्करस्तिमिरं यथा।
पुनर्नवा की जड़ दूध के साथ घिसकर आँख में लगाने से कण्डू (खुजली) को मधु के साथ नेत्रस्राव को, घी के साथ फूली को, तेल के साथ तिमिर को तथा काञ्जी के साथ रतौंधी को उस प्रकार नष्ट करती है, जैसे सूर्य अन्धकार को।
बब्बूल रसक्रिया बब्बूलदलनिःक्वाथो लेहीभूतस्तदञ्जनात् ॥ १०१॥ नेत्रस्त्रावं जयत्येष मधुयुक्तो न संशयः।
बब्बूल के पत्तों का क्वाथ करके उसे छानकर फिर पकायें, जब गाढ़ा हो जायें तो उसमें मधु मिलाकर अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव को जीतता है। इसमें कुछ भी सन्देह नही है।
हिज्जल-रसक्रिया हिज्जलस्य फलं घृष्ट्वा पानीये नित्यमञ्जनम् ॥ १०२॥ चक्षुःस्त्रावोपशान्त्यर्थं कार्यमेतन्महौषधम्।
हिज्जल (समुद्रफल) के फल को जल में घिसकर प्रतिदिन अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव की शान्ति के लिए महौषध है।
कतक-रसक्रिया कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् ॥ १०३॥ ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम्।
कतक (निर्मली) के फल को घिसकर मधु तथा कपूर मिलाकर अञ्जन करें। इससे नेत्र का प्रसादन (प्रसन्नता) होता है।
शिरोत्पात में रसक्रिया सर्पिः क्षौद्रं चाञ्जनं स्याच्छिरोत्पातस्य शान्तये ॥ १०४॥
शिरोत्पात (आँख में जो लाल-लाल सिरायें दिखलायी पड़ती हैं) की शान्ति के लिये घी तथा मधु का अञ्जन लगाना चाहिये।
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