भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 287


[स्तम्भ १]

कृष्णसर्प वसाञ्जन कृष्णसर्पवसा शङ्खः कतकात्फलमञ्जनम्। रसक्रियेयमचिरादन्धानां दर्शनप्रदा।। 105 ।। शंखनाभि, निर्मली के बीज तथा अञ्जन (कालासुरमा) को भली-भाँति पीसकर काल साँप की वसा में मिला दें। यह अञ्जन अन्धों को भी शीघ्र ही दर्शन-शक्ति प्रदान करता है। वक्तव्य—शंखनाभि तथा अञ्जन को अलग अलग पीस लें और निर्मली के बीजों को कूटकर तथा जल डालकर पृथक् से पीसना चाहिये। इसे पीसने में अधिक परिश्रम लगता है। इन सबका साँप की चर्बी में मिला लें। सर्पवसा सपेरों से मिल जाती है।

लेखनाञ्जन दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः । द्रव्यैरञ्जनयोगोऽयं पुष्पार्मादिविलेखनः ।। 106 ।। मुरगी के अण्डों के छिलके, मैनसिल, काँच, शंख, लाल चन्दन तथा सेंधा नमक इन द्रव्यों का अञ्जनयोग (अञ्जन लगाने का निरन्तर अभ्यास), पुष्प (फूल) तथा अर्म आदि को काट देता है। वक्तव्य—काँच को तपाकर निर्मल जल में तब तक बुझाना चाहिये जब तक उसकी चमक नष्ट न हो जाये। इसी काँच के बारीक चूर्ण का अञ्जन में प्रयोग किया जाता है।

कणा-अञ्जन कणा छागयकृन्मध्ये पक्त्वा नेत्रयुगेऽञ्जिता। अचिराद्धन्ति नक्तान्ध्यं तद्वत् सक्षौद्रभूषणम् ।। 107 ।। पिप्पली को बकरे के यकृत् में रखकर पुटपाक विधि से पकायें और फिर घिसकर आँखों में लगायें। यह रतौंधी को शीघ्र ही नष्ट कर देती है। इसी प्रकार मरिच को भी तैयार कर और मधु के साथ मिलाकर लगाना चाहिये। वक्तव्य—उक्त सभी अंजन रसरूप में मिलते हैं। इसके आगे चूर्णरूप अंजन कहे जायेंगे।

चूर्णाञ्जन (लेखन) शाणार्धं मरिचं द्वौ च पिप्पल्यर्णवफेनयोः। शाणार्धं सैन्धवं शाणा नव सौवीरकाञ्जनात् ।। 108 ।। पिष्टं सुसूक्ष्मं चित्रायां चूर्णाञ्जनमिदं शुभम्। कण्डूकाचकफार्तानां मलानां च विशोधनम् ।। 109 ।। मरिच चूर्ण दो माशा, पीपल तथा समुद्रफेन आठ-आठ माशा, सेंधा नमक, दो माशा तथा सफेद सुरमा छत्तीस माशा


[स्तम्भ २]

इन द्रव्यों को चित्रा नक्षत्र में अत्यन्त सूक्ष्म पीसना चाहिये। यह उत्तम चूर्ण अञ्जन है। यह खुजली, काच तथा कफजनित विकारों तथा आँखों के मल (काचड़) को शुद्ध करता है।

चूर्णाञ्जन (रोपण) शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगा प्लाव्‍य वारिणा। गृह्णीयात् तज्जलं सर्वं यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। 110 ।। शुष्कं च तज्जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत्। विचूर्ण्य भावयेत् सम्यक् त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। 111 ।। कर्पूरस्य रजस्तत्र दशमांशेन निक्षिपेत्। अञ्जयेन्नयने तेन सर्वदोषहरं हि तत् ।। 112 ।। सर्वरोगहरं चूर्णं चक्षुषोः सुखकारि च। खपरिया को शिला (खरल)पर पीसकर और जल में घोलकर रख दें, जब जल नितर जाये तो सावधानी से उसको ले लें और नीचे बैठे हुये चूर्ण को फेंक दें, फिर उस जल को धूप में सुखा लें। जल के सूख जाने पर पपड़ी जैसा पदार्थ उपलब्ध होगा, इसको खरल में डालकर और पीसकर त्रिफला के स्वरस की तीन भावना दें, अन्त में उक्त द्रव्य का दसवाँ भाग कपूर मिलाकर रख लें। इसको आँख में लगाने से यह सभी प्रकार के नेत्र दोषों तथा रोगों को हरता है। यह आँखों के लिए सुखदायक है। वक्तव्य—खपरिया को पीसकर पानी में डाल दें। उसका घुलनशील भाग पीना में घुल जाता है। पानी के सूखने पर वही पर्पटी जैसा प्राप्त होता है।

चूर्णाञ्जन (प्रसादन) अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत् त्रिफलारसैः।। 113 ।। सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम्। अञ्जयेत् तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् ।। 114 ।। सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः। सौवीराञ्जन (सफेद सुरमा) को अग्नि में तपाकर त्रिफला के स्वरस में तथा स्त्री के दूध में सात-सात बार बुझायें और फिर पीस लें। इसको प्रतिदिन नेत्रों में लगायें। यह आँख के सभी विकारों को नष्ट कर देता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

शलाका-निर्माण-विधि त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा ।। 115 ।। गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः। तच्छलाकाऽञ्जन्त्येन सर्वानेत्रभवान् गदान् ।। 116 ।।