शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें288 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे सीसा धातु को पिघला कर त्रिफला, भाँगरा तथा सौंठ के | जमालगोटा की मज्जा (मीगी) को नींबू के रस को स्वरस में बुझायें और इसी प्रकार घी, गोमूत्र, मधु तथा बकरी | इक्कीस भावना दें और निरन्तर पीसते रहें, फिर इसकी बत्ती के दूध में बुझायें। सीसे की यह शलाका (सलाई) नेत्रों में | बना लें। इस बत्ती को मनुष्य की लार या थूक में घिसकर होने वाल सभी रोगों को अवश्य हरती है। | आँख में लगायें। यह साँप के विष को जीतकर मनुष्य को वक्तव्य-सभी प्रकार के सुरमे तथा अंजन आदि उक्त | पुनः जीवित कर देता है। शीशे की शलाका द्वारा लगाये जाते हैं और शुद्ध करके बनायी | वक्तव्य-यह अञ्जन विशेष करके सर्प द्वारा डसे हुये गयी सीसा की सलाई का प्रयोग भी चक्षुष्य होता है। | व्यक्ति को सचेत कर प्रयुक्त किया जाता है। इससे प्रत्यञ्जन-विधि | आश्चर्यजनक लाभ होते देखा गया है। गतदोषमपेताश्रु सम्पश्यन् सम्यगम्भसा। | नेत्र-प्रसादन-विधि प्रक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। 117 ।। | भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्दीयते यदि। न वाऽनिर्गतदोषेऽक्षिण धावनं सम्प्रयोजयेत्। | जाता रोगा विनश्यन्ति तिमिराणि तथैव च ।। 123 ।। प्रत्यञ्जनं तीक्ष्णतप्ते नेत्रे चूर्णं प्रसादनम् ।। 118 ।। | भोजन करने के पश्चात् दोनों हाथों को परस्पर घिसकर जब दोष या उपद्रव शान्त हो जाये, आँसू बन्द हो जायें | यदि प्रतिदिन आँखों को मला जायें तो उत्पन्न हुये नेत्र रोग और भली-भाँति देखने लग जायें तब जल से नेत्रों को धोकर | तथा तिमिर रोग नष्ट हो जाते हैं। दोषों के अनुसार प्रत्यञ्जन का प्रयोग करें। जब तक दोष | नेत्र-सिंचन-विधि शान्त न हो जाये तब तक धावन (आँख धोना) का प्रयोग न | शीताम्बुपूरितमुखः प्रतिवासरं यः करें। तीक्ष्ण औषधियों से तपे हुये नेत्र में प्रसादन (नेत्र को | कालत्रयेण नयनद्वितयं जलेन। स्वच्छ करने वाले) अञ्जन का प्रयोग करें। | आसिञ्चति ध्रुवमसौ न कदाचिदक्षि- वक्तव्य-जिसका प्रतिदिन नेत्रों में प्रयोग किया जाता है | रोगव्यथाविधुरतां भजते मनुष्यः ।। 124 ।। और जो प्रतिदिन आँखों को स्वस्थ रखने के लिए प्रयुक्त किया | शीतल जल से मुख को भरकर जो मनुष्य प्रतिदिन तीन जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं। विशेष देखें-सु०उ०अ० 18। | बार (प्रातः, दोपहर तथा सायंकाल) दोनों आँखों को जल नयनामृताञ्जन | (शीतल जल) से सींचता है, वह अवश्यमेव कभी भी आँखों शुद्धे नागे दुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत्। | के रोगों की व्यथा (पीड़ा) से व्याकुलता को प्राप्त नहीं कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।। 119 ।। | होता। दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे प्रदापयेत्। | नेत्र-रक्षा का महत्त्व एतत् प्रत्यञ्जनं नेत्रगदजिन्नयनामृतम् ।। 120 ।। | चक्षूरक्षायां सर्वकालं मनुष्यै- शुद्ध सीसा धातु को पिघलायें और तत्काल उसमें समभाग | र्यत्नः कर्तव्यो जीविते यावदिच्छा। शुद्ध पारद डाल दें तथा उसका हिलाकर या घोलकर खरल में | व्यर्थो लोकोऽयं तुल्यरात्रिन्दिवानां डाल दें (उसे दो तीन घण्टे तक उसे भली-भाँति घोटें) उसके | पुंसामन्धानां विद्यमानेऽपि वित्ते ।। 125 ।। बाद दोनों के समान भाग में कालासुरमा डालकर देर तक | जब तक जीवित रहने की इच्छा हो तब तक मनुष्यों को पीसें। अत्यन्त सूक्ष्म हो जाने पर सबकी अपेक्षा दसवाँ भाग | नेत्रों की रक्षा का सर्वदा यत्न करते रहना चाहिये, क्योंकि उसमें कपूर मिला दे। यह प्रत्यञ्जन नेत्र के सभी विकारों को | अन्धे मनुष्यों के लिये तो रात-दिन समान होता है। ऐसे लोगों जीतता है। | लिये धन रहने पर भी सम्पूर्ण संसार आँखा के न रहने कारण सर्पविषनाशक अञ्जन | व्यर्थ होता है। जयपालभवां मज्जां भावयेन्निम्बुकद्रवैः। | ग्रन्थकार की प्रार्थना एकविंशतिवेलं तत् ततो वर्तिं प्रकल्पयेत् ।। 121 ।। | आयुर्वेदसमुद्रस्य गूढार्थमणिसञ्चयम्। मनुष्यलालया घृष्ट्वा ततो नेत्रे तयाऽञ्जयेत्। | ज्ञात्वा कैश्चिद् बुधैस्तैस्तु कृता विविधसंहिताः ।। 126 ।। सर्पदष्टविषं जित्वा सञ्जीवयति मानवम् ।। 122 ।। | किञ्चिदर्थं ततो नीत्वा कृतेयं संहिता मया। | कृपाकटाक्षमिक्षेपमस्यां कुर्वन्तु साधवः ।। 127 ।।