शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 325, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 289 [वाम स्तम्भ] आयुर्वेद सागर के गूढ़ अर्थ (विषयरूपी) मणियों के सञ्चय (खजाने) को कुछ विद्वानों ने जाना या समझा है। तदनुसार उन्होंने अनेक संहितायें भी रची हैं। उन संहिताओं (चरक, सुश्रुत आदि) में से कुछ अर्थ (विषय) को लेकर मैं (शार्ङ्गधराचार्य) ने यह संहिता बनायी है। सज्जन लोग इस पर सदैव कृपा-दृष्टि डालते रहें। शुभकामना विविधगदार्तिदरिद्रनाशनं या हरिरमणीव करोति योगरत्नैः। विलसतु शार्ङ्गधरस्य संहिता सा कविहृदयेषु सरोजनिर्मलेषु।।128।। जो (संहिता) योगरूपी रत्नों द्वारा हरिरमणी (लक्ष्मी) के समान अनेक प्रकार के रोगों की पीड़ारूपी दरिद्रता का नाश करती है शार्ङ्गधराचार्य द्वारा रचित वह संहिता कवियों तथा कविराजों के कमल के समान निर्मल हृदयों में सदैव विलास करती रहे। ग्रन्थ की उपयोगिता अल्पायुषामल्पधियामिदानीं कृतं समस्तश्रुतिपाठशक्त्या। तदत्र युक्तं प्रतिबीजमात्र- मभ्यस्यतामात्महितं प्रयत्नात्।।129।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे नेत्रप्रसादनविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः।।13।। आजकल छोटी आयु तथा छोटी बुद्धि वाले मनुष्य सम्पूर्ण आयुर्वेद के ग्रन्थो को पढ़ने की शक्ति नहीं रखते। इसलिये मैं (शार्ङ्गधराचार्य) ने इस संहिता में आयुर्वेद के बीज (मौलिक भाव) लिख दिये हैं। अतः आप सब अपने लाभ के लिये परिश्रमपूर्वक इसका अभ्यास करें। वक्तव्य-चिकित्सक को चिकित्सा काल में सब प्रकार से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, इसीलिए कहा गया है-'चिकित्सितात् पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः'। सु० क०अ० 8.142। इसमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि परहित के साथ साथ इससे अपना हित भी इससे हो जाता है, क्योंकि चिकित्सक सर्वदा यही चाहता है-'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः'। [दक्षिण स्तम्भ] प्रतिसंस्कर्ता का निवेदन षड्विंशतिः पद्यशतानि पूर्वं प्रतिश्रुतं शार्ङ्गधरेण यत् सा। सङ्ख्या क्वचित् संस्करणेऽद्य पूर्णा नाऽऽलोक्यते तत्प्रदुनोति चित्तम्।।1।। आचार्य शार्ङ्गधर ने अपनी इस संहिता के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा की थी, कि इस ग्रन्थ की श्लोक संख्या छब्बीस सौ है। परन्तु आज उपलब्ध किसी भी संस्करण में उक्त संख्या दृष्टिगोचर नहीं होती, जिससे मानसिक कष्ट हो रहा था।।1।। उपेक्षया प्रस्तुतसंहिताया आसं मुहुश्चिन्तितमानसः प्राक्। पूर्तिः कथं स्यादिति तर्कयन् द्वाग्गुरोः कृपा प्रादुरभूत् ततो मे।।2।। इस प्रकार विद्वानों द्वारा शार्ङ्गधरसंहिता की उपेक्षा को देखकर मैं पहले अत्यन्त चिन्तित था और सोचा करता था, कि इसकी पूर्ति कैसे हो; तभी मेरे ऊपर गुरुचरणों की कृपा हुई।।2।। ग्रन्थं समालोक्य सुसूक्ष्मबुद्ध्या संस्मृत्य पूर्वान् भिषगुत्तमांश्च। ग्रन्थानुरोधाद् विषयानुरोधात् पूर्तिमयाऽकारि च तत्त्वदृष्ट्या।।3।। तदनन्तर मैंने सूक्ष्म बुद्धि से ग्रन्थ का अवलोकन किया और प्राचीन आयुर्वेदविद् महर्षियों का स्मरण कर उनके ग्रन्थों का अवलोकन किया। तदनन्तर ग्रन्थ तथा विषय को ध्यान में रखकर तात्त्विक दृष्टि से इसकी पूर्ति कर दी।।3।। प्रतिसंस्कारमासाद्य पूर्णेयं कृतिरुत्तमा। रोगिणां रोगनाशाय कल्पतां भिषजां मुदे।।4।। मेरे द्वारा प्रतिसंस्कृत यह उत्तम कृति रोगियों के रोगों का नाश करे और विद्वान् चिकित्सकों को आनन्द प्रदान करे।।4।। पुरा विकृतिमापन्ना श्रीशार्ङ्गधरसंहिता। अधुना संस्कृता श्रीमद् ब्रह्मानन्दत्रिपाठिना।।5।। इसके पहले यह शार्ङ्गधरसंहिता खण्डित (अपूर्ण) थी। अब श्री ब्रह्मानन्द त्रिपाठी ने इसका प्रतिसंस्कार कर इसे पूर्ण कर दिया है।।5।। [अन्तिम पुष्पिका] इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का तेरहवाँ अध्याय समाप्त।। 13 ।। उत्तरखण्ड समाप्त-शार्ङ्गधरसंहिता समाप्त।