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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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आमुख भारतीय संस्कृत-वाङ्मय के आदिम स्रोत वेद हैं। परवर्ती सर्वविध साहित्य को उन-उनके रचयिताओं तथा संग्रहकर्ताओं ने किसी न किसी प्रकार अपने साहित्य की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए उन्हें वेदों से जोड़ा है। प्रस्तुत आयुर्वेदिक साहित्य तो अथर्ववेद का उपांग है ही। इसें ग्रन्थ के नाम के साथ जोड़ा गया 'संहिता' शब्द इसकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता को सूचित करता है। प्राचीन विद्वानों ने आयुर्वेदिक साहित्य को मूलतः बृहत्त्रयी तथा लघुत्रयी भेद से दो भागों में इस प्रकार विभक्त किया है-1. बृहत्त्रयी-चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, अष्टांगसंग्रह अथवा अष्टांगहृदय। 2. लघुत्रयी- माधवनिदान, शार्ङ्गधरसंहिता, भावप्रकाश। ध्यान रहे, इस वर्गीकरण से आयुर्वेद का विपुल साहित्य छूट जाता है। श्रीशार्ङ्गधराचार्य ने इस संहिता में उपलब्ध विषयवस्तु का अधिकांश संग्रह चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन संहिताओं से और कुछ रसशास्त्र के प्रतिनिधि ग्रन्थों से किया है। इस प्रकार आर्षसंहिताओं के सारभूत तथा प्रकरणोचित विषयों का इसमें संग्रह होने के कारण आज भी समाज में प्रस्तुत संहिता का आदर प्राचीन संहिताओं की भाँति ही देखा जाता है। नामकरण-प्राचीन संस्कृत-साहित्य में ग्रन्थों के नामकरण की मूलतः दो परम्पराएँ देखी जाती हैं। प्रथम- ग्रन्थकार के नाम के अनुसार और द्वितीय-ग्रन्थ के विषय वस्तु के आधार पर। जैसे-चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, भेड- (भेल)संहिता, काश्यपसंहिता, हारीतसंहिता, माधवनिदान, चक्रदत्त आदि नाम ग्रन्थकारों के नामों के अनुसार ही रखे गये हैं। दूसरी विधि से नामकरण के उदाहरण इस प्रकार हैं, जैसे-माधवकर द्वारा रचित निदान का नाम 'रोगविनिश्चय', वृद्धवाग्भट द्वारा रचित ग्रन्थ का नाम 'अष्टांगसंग्रह' और वाग्भट द्वारा रचित ग्रन्थ का नाम 'अष्टांगहृदय' आदि अनेक उदाहरण हैं। यही स्थिति 'शार्ङ्गधरसंहिता' के नाम-निर्धारण की भी है, जिसका सीधा सम्बन्ध ग्रन्थकार के नाम से है। इस ग्रन्थ के साथ जुड़ा हुआ 'संहिता' शब्द मात्र ग्रन्थ की प्रामाणिकता का परिचायक है। ग्रन्थकार-परिचय-संस्कृत-साहित्य के ग्रन्थकारों की एक प्राचीन परम्परा यह भी रही है, कि वे सर्वथा उदार होते हुए भी आत्म-परिचय देने में प्रायः कृपण देखे जाते हैं। उसी परम्परा के अनुयायी आचार्य शार्ङ्गधर भी प्रतीत होते हैं। इनके प्रस्तुत ग्रन्थ में केवल दो स्थानों पर इनके नाम का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-1. 'विधीयते शार्ङ्गधरेण' (शा० सं० प्र० खं० अ० 1.2) तथा 2. 'विलसतु शार्ङ्गधरस्य संहिता' (शा० सं० उ० खं० अ० 13.128)। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत संहिता के कुछ प्राचीन संस्करणों के अध्यायान्त में दी गयी पुष्पिका में इस प्रकार का उल्लेख मिलता है-'इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां श्रीशार्ङ्गधरसंहितायां.... समाप्तः'। किन्तु इसे अधिकांश टीकाकारों ने अप्रामाणिक समझकर उद्धृत नहीं किया है। अनेक शार्ङ्गधर-ऑफ़्रेक्ट ने 'कैटलाग्स् कैटलागंरम्' नामक अपनी ग्रन्थ-सूची में निम्नलिखित अनेक शार्ङ्गधरों का उल्लेख इस प्रकार किया है-1. चण्डमाल के कर्ता शार्ङ्गधर, 2. दार्शनिक शेषशार्ङ्गधर, 3. ज्योतिर्विद् शार्ङ्गधर मिश्र, 4. नाटककार शार्ङ्गधर, 5. त्रिशती या वैद्यवल्लभ के लेखक शार्ङ्गधर, 6. शार्ङ्गधरपद्धति के संग्रहकर्ता शार्ङ्गधर तथा 7. शार्ङ्गधरसंहिताकार शार्ङ्गधर। इसके अतिरिक्त ऑफ़्रेक्ट ने अपने उक्त सूचीपत्र में जिन दो शार्ङ्गधरों (पद्धति तथा संहिताकार) को एक स्वीकार किया है, वे अन्ततः साक्ष्य के तथा कालक्रम के आधार पर परस्पर भिन्न हैं। शार्ङ्गधर-पद्धति में कवि ने जो