भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० १, ब्रा० १-२, कं० ७-१२ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३२६ ठीक) दिशा वह है जहां से देव चढ़े थे। उत्तर की दिशा मनुष्यों की है। इसीलिए मनुष्यों के मकान या दालान उदीचीन वंश (अर्थात् दक्षिण से उत्तर की ओर जानेवाली धन्नियों के) होते हैं क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। केवल दीक्षित के लिए प्राचीन वंश मकान होवे; अदीक्षित के लिए नहीं ॥७॥ उसको घेर देते हैं कि कहीं वर्षा न हो। कम-से-कम वर्षा में (तो यह होना ही चाहिए)। जो दीक्षा लेता है वह देवों के निकट आ जाता है, वह देवों में से एक हो जाता है। देव मनुष्यों से छिपे हुए होते हैं। जो घिरा होता है वह भी छिपा हुआ होता है। इसलिए उसे घेर लेते हैं ॥८॥ इसमें सब कोई न घुसे; केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही। क्योंकि यही यज्ञ के अधिकारी हैं ॥६॥ वह सबसे बात न करे। जो दीक्षा लेता है वह देवों के समीप हो जाता है, वह देवताओं में से एक हो जाता है। देवता सबसे नहीं बोलते; केवल ब्राह्मण से, क्षत्रिय से और वैश्य से। क्योंकि यही यज्ञ के अधिकारी हैं। यदि शूद्र से बोलने की आवश्यकता पड़े तो (द्विजों से ही) एक को कहे- "इससे ऐसा कह दो ! इससे ऐसा कह दो।" दीक्षित पुरुष के लिए यही उपचार है ॥१०॥ अब दो अरणियों को हाथ में लेकर शाला को पसन्द करता है और पूर्व की ओर के विशेष आसन पर बैठकर यह यजुः पढ़ता है- "एदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासोऽअजुषन्त विश्वे" (यजु० ४।१)- "हम पृथिवी के उस यज्ञ-स्थान पर आये हैं जिसको सब देवताओं ने पसन्द किया।" इस प्रकार यह सब देवों तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा पसन्द हो जाती है। और जिसको वेदपाठी ब्राह्मण आँखों से देख लेते हैं वह उनको पसन्द हो जाती है ॥११॥ और जब वह कहता है- 'यत्र देवासोऽअजुषन्त विश्वे' (जिसको सब देवों ने पसन्द किया) तो सब देवता उसकी खातिर उसको पसन्द कर लेते हैं। अब वह पढ़ता है- "ऋक् सामाभ्या॑ सन्तरन्तो यजुर्भिः" (यजु० ४।१) - "ऋक्, साम और यजुओं द्वारा तरते हुए।" ऋक् साम और यजुः द्वारा ही यज्ञ को पूरा करते हैं, इससे उसका तात्पर्य है कि मेरा यज्ञ पूर्णता को प्राप्त हो। अब कहता है- "रायस्पोषेण समिषा मदेम" (यजु० ४।१) - "धन और पुष्टि को पाकर आनन्द मनावें।" 'रायस्पोष' का अर्थ है 'बहुतायत' (भूमा)। बहुतायत ही 'श्री' है। इस प्रकार वह आशीर्वाद देता है। वह कहता है- 'समिषा मदेम' (इष अर्थात् ओज के साथ) क्योंकि जो कोई श्री वाला हो जाता है या बड़प्पन को प्राप्त होता है उसको लोग कहते हैं कि यह इष अर्थात् ओज को पाकर प्रसन्न हो रहा है। इसलिए कहा- 'समिषा मदेम' ॥१२॥ अध्याय १—ब्राह्मण २ अपराह्न अर्थात् दोपहर के बाद दीक्षा दे। केश और दाढ़ी मुंड़ाने से पहले जो मन चाहे या जो मिल सके उसे खा ले, क्योंकि इसके पीछे व्रत ही उसका भोजन होता है (अर्थात् दूध आदि) परन्तु यदि खाना न चाहे तो न खावे ॥१॥ [१४००] अब शाला के उत्तर में स्थान घेरते हैं। उसमें जल का एक घड़ा रखते हैं। इसके पास नाई बैठता है। अब (यजमान) बाल और दाढ़ी मुंडवाता है और नाखून कतरवाता है, क्योंकि पुरुष का वह भाग अमेध्य या अपवित्र समझा जाता है जहाँ पानी नहीं पहुँचता। उसके बाल,