शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ४, ब्रा० १-२, कं० २०-२६ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३६६ अग्नि का जन्म-स्थान है' ॥२०॥ अब वह दो दर्भ के डंठल रखता है, यह मन्त्र पढ़कर- "वृषणौ स्थ" (यजु० ५।२) - "तुम नर हो।" यहाँ ये इसी प्रकार हैं जैसे किसी स्त्री के दो बच्चे एक-साथ उत्पन्न हुए हों ॥२१॥ अब वह अधरारणि (नीचे की लकड़ी) को रखता है यह मन्त्र पढ़कर- "उर्वश्यसि" (यजु० ५।२)-"तू उर्वशी है।" अब वह घी की थाली को उत्तरारणि (ऊपर की लकड़ी) से छूता है, यह मन्त्र कहकर - "आयुरसि" (यजु० ५।२) - "तू आयु है।" और उसको (अधरारणि के ऊपर) रख देता है यह कहकर - "पुरूरवाऽसि" (यजु० ५।२) - "तू पुरूरवा है।" उर्वशी अप्सरा थी और 'पुरूरवा' उसका पति था, और उनके जोड़े से जो लड़का उत्पन्न हुआ वह 'आयु' था। इसी प्रकार वह यज्ञ को जोड़े से उत्पन्न करता है। अब वह (होता से) कहता है कि मथी जानेवाली आग से प्रार्थना कर ॥२२॥ अब वह आग का मंथन करता है यह पढ़कर- "गायत्रेण त्वा छन्दसा मन्थानि त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा मन्थानि जागतेन त्वा छन्दसा मन्थानि' (यजु० ५।२)--"तुझे गायत्री छन्द से मथता हूँ, त्रिष्टुभ् छन्द से मथता हूँ, जगती छन्द से मथता हूँ।" अग्नि को छन्दों से मथता है, या मथ जाती हुई अग्नि के लिए मन्त्र पढ़ता है। इस प्रकार वह छन्दों को यज्ञ से संयुक्त कर देता है जैसे किरणें उस सूर्य से संयुक्त होती हैं। फिर कहता है 'इस उत्पन्न हुए के लिए मन्त्र पढ़ो।' जब उसको 'आहवनीय' पर डालता है तो कहता है, 'डाले हुए के लिए मन्त्र पढ़ो' ॥२३॥ वह अग्नि को इस मन्त्र से (वेदी में) डालता है - "भवतं नः समनसौ सचेतसावरेपसौ। सा यज्ञ॒ꣳ हि॒ꣳसिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः" यजु० ५।३)- "हमारे लिए तुम एक मनवाली, एक बुद्धिवाली और पापरहित हो जाओ। यज्ञ को हानि न पहुँचाओ। यज्ञपति को हानि न पहुँचाओ। हे दोनों जातवेद अग्नियो ! आज हमारे लिए कल्याणकारी हो जाओ।" दोनों की शान्ति के लिए वह ऐसा कहता है जिससे एक-दूसरे को हानि न पहुँचा सकें ॥२४॥ अब स्रुवा से घी लेकर इस मन्त्र से अग्नि में छोड़ता है - "अग्नावग्निश्चरति प्रविष्टऽ- ऋषीणां पुत्रोऽअभिशस्तिपावा। स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यं॒ सदमप्रयुच्छन्त्स्वाहा" (यजु० ५।४)-"ऋषियों का पुत्र पाप से बचानेवाले अग्नि (आहवनीय अग्नि) में प्रविष्ट होकर चलता है। वह अग्नि हमारे लिए सुखकर होकर अच्छे प्रकार यज्ञ करे, देवताओं के लिए हवि को कभी वंचित न करते हुए।" आहुति के लिए अग्नि को उत्पन्न किया और आहुति से ही उसको प्रसन्न किया। इसलिए उसमें यह आहुति देता है ॥२५॥ अन्त में इसमें इडा आती है। इसके पीछे अनुयाज नहीं होते। आतिथ्य यज्ञ का सिर है। सिर पूर्वार्ध होता है। उसको यज्ञ का पूर्वार्द्ध करके संस्कृत करता है। यदि वह अनुयाज को करता तो सिर की जगह पैर कर देता। इसलिए अन्त में इडा आती है और अनुयाज नहीं होता ॥२६॥ अध्याय ४ - ब्राह्मण २ जब देवताओं ने आतिथ्य कर लिया तो उनमें झगड़ा हो गया। वे चार भागों में बँट गये और एक-दूसरे की महत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। कहते हैं कि अग्नि वसुओं के साथ हुआ, सोम रुद्रों के, वरुण आदित्यों के, इन्द्र मरुतों के और बृहस्पति विश्वेदेवों के, परन्तु ये जो चार भागों में बँटे वे 'विश्वेदेव' ही थे। जब वे अलग-अलग हो गये तो असुर राक्षस उनके बीच में आ घुसे ॥१॥ उनको मालूम हो गया- 'अरे हम पापी हो गये, असुर राक्षस हमारे बीच में आ घुसे हैं, शत्रु अवश्य हमको विध्वंस कर देंगे' आओ, हम अपने में से एक की महत्ता स्वीकार कर लें!' तब