शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 421, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १०-१६ व १-२ शतपथब्राह्मण / ४०३ चलता है, चारों ओर चलता है। इसीलिए कहा कि 'आपतये त्वा' आदि ॥१०॥ “तनूनप्त्रे शाक्वराय” (यजु० ५।५)-“बलवान् तनूनप्तृ के लिए।” 'तनूनप्तृ शाक्वर' से तात्पर्य है वायु। यह आज्य उसी के लिए ग्रहण करता है, इसलिए कहा 'तनूनप्त्रे' इति ॥११॥ “शक्वनेऽओजिष्ठाय” (यजु० ५।५)-“शक्तिवाले और ओज के लिए।” वस्तुतः वही (वायु) शक्तिवाला और ओजवाला है। उसी के लिए वह ग्रहण करता है, इसलिए कहता है- 'शक्वने' इति ॥१२॥ अब वे इसको छूते हैं। देवतागण इस बात पर एकमत हो गये थे कि जो हममें से इसका उल्लङ्घन करेगा उसकी यह गति होगी। इसी प्रकार यह होता और यजमान भी इस बात पर एकमत हो जाते हैं कि जो कोई हममें से इसका उल्लङ्घन करेगा उसकी ऐसी गति होगी ॥१३॥ वे इस मन्त्र को बोलकर छूते हैं-“अनाधृष्ट मस्यनाधृष्यं देवानामोजः” (यजु० ५।५)- “तू अजेय है (कोई तुझको जीत नहीं सकता) क्योंकि देवताओं का ओज अजेय होता है।” क्योंकि देवता-गण जब एक मिलकर बोलते और एक-साथ रहते हैं तो अजेय होते हैं, कोई उन- पर आक्रमण नहीं कर सकता। 'देवों के ओज' का अर्थ है उनके प्यारे शरीर और धाम अर्थात् शक्तियाँ। अब कहा-“अनभिशस्त्यभिशस्तिपा ऽअनभिशस्तेन्यम्” (यजु० ५।५)-“जिन पर शाप नहीं लगा, जो शाप से रक्षा करते हैं और जिनपर शाप नहीं लग सकता।” क्योंकि सब देव शाप को पार कर जाते हैं। “अञ्जसा सत्यमुपगेषम्” (यजु० ५।५)-“सीधा सच को प्राप्त हो जाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि सत्य ही बोलूँ और व्रत का उल्लङ्घन न करूँ। अब कहा-“स्वित्ते मा धाः” (यजु० ५।५)-“मुझे कल्याण में स्थापित कर।” क्योंकि निश्चय ही देवों ने अपने को कल्याण में स्थापित किया जब उन्होंने सत्य बोला और जो सत्य था उसी को किया। इसीलिए कहा-‘स्वित्ते मा धाः’ ॥१४॥ देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों को इकट्ठा किया था उनको उन्होंने इन्द्र में स्थापित कर दिया। निश्चय करके इन्द्र वही है जो वह तपता है. (अर्थात् सूर्य)। यह पहले तपता (चमकता) नहीं था। यह ऐसा ही काला (अन्धकारमय) था जैसे अन्य सब। यह वही (देवों का दिया हुआ) पराक्रम है जिससे वह चमकता है। इसलिए यदि बहुत-से दीक्षित होते हों तो इस (तानूनप्त्र आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को ही देना चाहिए, क्योंकि गृहपति ही इन्द्र के तुल्य है; और यदि दक्षिणा के साथ दीक्षा हो तो इस (आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को ही देना चाहिए क्योंकि कहा भी है कि 'यजमान ही इन्द्र है' ॥१५॥ देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों (शक्तियों) को इकट्ठा किया वह सब मिलाया गया और वह साम हो गया। इसीलिए कहा है 'साम सत्य है, साम देवज (देवों से उत्पन्न हुआ) है' ॥१६॥ अध्याय ४-ब्राह्मण ३ जब देव आतिथ्य-इष्टि कर चुके तो उनमें झगड़ा हो गया। इसको उन्होंने तानूनप्त्र द्वारा शान्त किया और इच्छा करने लगे कि यह जो हमने एक-दूसरे की बुराई की है, उसका प्रायश्चित्त होना चाहिए। अवभृथ स्नान से पहले उन्होंने कोई और प्रायश्चित्त रखा नहीं था। इसलिए उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा निकाली ॥१॥ अग्नि के द्वारा उन्होंने त्वचा से शरीर को ढक लिया। अग्नि का अर्थ है 'तप' और दीक्षा