शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
by भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास
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Read in contextउस मार्गका क्रम यह है कि, धूम फिर रात्रिअभिमानी देवता के निकट फिर कृष्णपक्षाभिमानी देवता के निकट फिर दक्षिणायन अभिमानी देवता के निकट फिर वहांसे पितृलोकमें जाता है, पितृलोकसे आगे चन्द्रलोकको प्राप्त हो दिव्य देह पाकर महालक्ष्मीका भोग करता है ॥१५॥ वहां यह चन्द्रमाकीही समान होकर कर्मकी फलकी अवधितक चन्द्रलोकमें वास करता है, जब पुण्य फल समाप्त हो जाता है तो जिस क्रमसे इस लोकमें गमन हुआ था उसी क्रमसे इस लोकमें फिर आता है ॥१६॥ चन्द्रलोकसे चलते समय उस शरीरको छोड़ यह आकाशरूप होकर आकाशसे वायुमें और वायुसे जलमें आता है ॥१७॥ जलसे मेघोंमें प्राप्त होकर फिर यह वर्षाद्वारा पृथ्वीपर पतित होता है, फिर अनेक कर्मके वश होकर भक्षण योग्य अन्नमें प्राप्त होता है ॥१८॥ और कितने एक शरीरप्राप्तिके निमित्त मनुष्यादि योनिमें प्राप्त होते है और कितने एक कर्म और ज्ञानके तारतम्यसेस्थावरत्व को प्राप्त हो जाते है ॥१९॥ जो जीव अन्नमें प्राप्त हुए है, उस अन्नको स्त्री पुरुष भक्षण करते है उससे स्त्री और पुरुषोंका रज और शुक्र होकर उन दोनोंके संयोगसे वह गर्भरूप धारण करते है ॥२०॥ यही जीव कर्मके अनुसार स्त्री, पुरुष और नपुंसक होता है, इस प्रकारसे इस जीवकी इस लोकमें गति और परलोकगति होती है अब इसकी मुक्तिका वर्णन करता हूँ ॥२१॥ जो शमदमादिसाधनसम्पन्न सदा अपने वर्णाश्रमके कर्म करते और फलकी आकांक्षा न करके ईश्वरापण कर देते है वह मनुष्य देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकपर्यन्त गमन करते है ॥२२॥ वह प्रथम ज्योतिमें प्राप्त हो पीछे दिन और फिर शुक्लपक्षाभिमानी देवताके निकट जाता है फिर उत्तरायणको प्राप्त होकर संवत्सरके निकट गमन करता है ॥२३॥ फिर सूर्यलोकको प्राप्त होता है, चन्द्रलोकसे भी ऊपर विद्युत लोकको प्राप्त होता है फिर उससे आगे कोई एक पुरुष दिव्य देहको प्राप्त हो ब्रह्मलोकको जाता है, और वहांसे येंहां नहीं आता है ॥२४॥ ब्रह्मलोकमें प्राप्त होकर दिव्य देहके आश्रित हो यह जीव रहता है, उस दिव्य देहसे ब्रह्मलोकमें अनेक प्रकारके मन इच्छित भोगोंको भोगता हुआ बहुत कालतक उस स्थानमें वासकर ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाता है है उसकी फिर आवृत्ति नही होती ॥२५॥२६॥ जिस प्रकारसे स्वप्नमें देखी हुई सृष्टि जाग्रत होतेही लय हो जाती है इसी प्रकारसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेसे यह सब सृष्टि लय हो जाती है और जिन्होने केवल पापही किये है और उपासना तथा पुण्यकर्मसे रहित उनकी तीसरी गति अर्थात नरक होता है ॥२७॥२८॥ वे अनेक प्रकारके रौरव, महारौरव, घोर नरकोंको भोगकर पीछे शेष कर्मोके अनुसार क्षुद्र जन्तुओंके शरीरको प्राप्त होते है ॥२९॥ पृथ्वीमें लीख, मच्छर, डांश आदिका जन्म लेता है, इस प्रकारसे जीवकी गति तुमसे वर्णन की अब और क्या सुनने की इच्छा है ॥३०॥ श्रीराम उवाच । रामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! आपने उपासना और कर्मफलसे अनेक प्रकारसे चन्द्रलोक और ब्रह्मलोककी प्राप्ति वर्णन की सो यथार्थ है ॥३१॥ गन्धर्वादि लोक और इन्द्रादि लोकोंमे किस प्रकारसे भोग प्राप्त होते है कोई देवता कोई इन्द्र और कोई गन्धर्व होता है ॥३२॥ हे शंकर! यह कर्मका फल है वा उपासनाका फल है सो कृपा करके वर्णन कीजिये, इसमें मुझे बड़ा सन्देह है ॥३३॥ श्रीभगवानुवाच । शिवजी बोले, उपासना और शुभकर्म, इन दोनोंहीके योगसे फल प्राप्त होता है, वह हम वर्णन करते है, जो मनुष्य युवा सुन्दर शूर नीरोग और बलवान हो ॥३४॥ वह यदि सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वीको निष्कंटक भोग करता हो उसका नाम मानुषानन्द है यह आनन्द साधारण मनुष्योंको देह प्राप्त होनेवाले आनन्दसे सौ गुणा अधिक है ॥३५॥ जो मनुष्य तप आदिसे संयुक्त हो वह गन्धर्व होता है मनुष्योंके आनन्दसे सौगुणा आनन्द गन्धर्वोको प्राप्त होता है ॥