शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
by भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास
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Read in context३६॥ इसी प्रकारसे ऊपर ऊपर पितृलोक देवादिलोकमें उत्तरोत्तर सौगुणा आनन्द बढता जाता है ॥३७॥ तिनमें भी देवता, देवतासे इन्द्र, इन्द्रसे बृहस्पति, बृहस्पतिसे ब्रह्मदेव, ब्रह्मदेवसे ब्रह्मानंद उत्तरोत्तर सौ २ गुणा अधिक है ॥३८॥ ज्ञानके आनंदसे अधिक आनंद तो देवलोकमें भी नही है, कारण कि, ज्ञानीको किस वस्तुकी अपेक्षा नही है कहींसे भय नहीं है, जो ब्राह्मण क्षत्रियादि वेदवेदांगके पारगामी निष्पाप और निष्काम है, और भगवँत् की उपासना करनेवाले है ॥ ३९॥ वह अनुक्रमसे उत्तर उत्तर आनंदको प्राप्त होते है परन्तु हे दशरथकुमार! यह जो कुछ आनंद है सौ आत्मज्ञानकी बराबर नही है इससे आत्मज्ञानका अनुष्ठान करना उचित है ॥४०॥ जो ब्राह्मण ब्रह्मदेवता है उसे कर्मउपासनासे कुछ प्रयोजन नही है न उसकी कर्मसे कुछ वृद्धि और न करनेसे कुछ हानि भी नही, जो शास्त्रने विहित कर्मोंका विधान और निषिध कर्मोंका निषेध किया है, वह कँवल जब तक ज्ञान नही तभीतक है, ज्ञान होने पर कुछ नही, और यदि ज्ञानी लोकस्थापनके निमित्त करे तो भी कुछ हानि नही ॥४१॥ इस कारणसे ज्ञानवान ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, जो कोई पुण्यवान ज्ञानी जानकर कर्म करता है उसके पुण्यका फल अक्षय होता है ॥४२॥ जिस फलको मनुष्य करोड ब्राह्मणके भोजन करानेसे प्राप्त होता है वह फल एक ज्ञानीके भोजन कराने से प्राप्त होजाता है ॥४३॥ जो वस्तु ज्ञानिजनों को दिया जाता है वह करोडगुण मिलती है और जो मनुष्योंमें अधम ज्ञानीकी निन्दा करता है वह क्षयरोगकौ प्राप्त होकर मृतक हो जाता है कारण कि, ज्ञानी साक्षात् ईश्वर है ॥४४॥ हे रामचन्द्र! जो निर्गुण को कठिन समझते है वह पहले सगुण उपासना करे, किसीभी सगुण उपासना करनेवाले की अधोगति नही होती, इस कारण सगुणरूपकी ही उपासना करके सुखी हो ॥४५॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे जीवगत्यादिनिरूपणं नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥
अध्याय १२ श्रीरामचंद्र बोले, दे देवदेव! महेश्वर आपको नमस्कार है आप उपासना की विधि और उसका देशकाल वर्णन कीजिये, कि किस समय किस प्रकार उपासना की जाय ॥१॥ ईश्वर उवाच । हे भगवन ! हमारे ऊपर आपकी कृपा होय तो उपासनाका अंग और नियम कहो, फिर शिवजी बोले हे राम! मै तुमसे उपासनाकी विधि और उसका देश काल कहता हूँ तुम मन लगाकर सुनो । जितने देवता है यह सब मेरे ही रूप है वास्तवमें मुझसे भिन्न नही ॥२॥३॥ जो दूसरे देवताओंके भक्त है, और श्रद्धापूर्वक उनका पूजन करते है, हे राजन!! वे पुरुष मेआ ही भेदबुद्धिसे यजन करने वाले है ॥४॥ जिस कारण कि, इस सम्पूर्ण संसारमें मेरे सिवाय और कुछ नही है, इसीसे मै सब क्रियाका भोक्ता और सबका फल देनेवाला हूँ ॥५॥ जो पुरुष विष्णु, शिव, गणेशादि जिस भावसे मेरी उपासना करते है, उसी भावनाके अनुसार उसी देवताके रूपसे मै उन्हें वांछित फलँ देता हूँ ॥६॥ विधिसे अविधिसे किसी प्रकारसे हो जो मेरी उपासना करते है उनको मै प्रसन्न होकर फल देता हूँ, इसमें कोई संदेह नही ॥७॥ यद्यपि वह दुराचारी है परन्तु वह अनन्य होकर मेरा भजन करता है उस पुरुषको साधुही मानना चाहिये, और पुण्यवान है यह भक्तिकी महिमा दिखाई है परन्तु यह निश्चय जानना चाहिये कि अनन्यभक्तिवाला किसी प्रकार