भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1019

उस समय आकाशमें विचरनेवाले चारण यों बोले—‘अब दशग्रीव रावणका यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धोंने भी यही बात दुहरायी॥ १० १/२ ॥

सीता छटपटा रही थीं। रावणने अपनी साकार मृत्युकी भाँति उन्हें अङ्कमें लेकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ ११ १/२ ॥

वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरीके द्वारपर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरीका विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावणने अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया॥ १२ १/२ ॥

कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोहमें डूबी हुई थीं। रावणने उन्हें अन्तःपुरमें रख दिया, मानो मयासुरने मूर्तिमती आसुरी मायाको वहाँ स्थापित कर दिया हो*॥ १३ १/२ ॥

इसके बाद दशग्रीवने भयंकर आकारवाली पिशाचिनोंको बुलाकर कहा—‘(तुम सब सावधानीके साथ सीताकी रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञाके बिना सीताको देखने या इनसे मिलने न पाये॥ १४ १/२ ॥

‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय; इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है॥ १५ १/२ ॥

‘तुमलोगोंमेंसे जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीतासे कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समझूँगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’॥ १६ १/२ ॥

राक्षसियोंको वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्तःपुरसे बाहर निकला और कच्चे मांसका आहार करनेवाले आठ महापराक्रमी राक्षसोंसे तत्काल मिला॥

उनसे मिलकर ब्रह्माजीके वरदानसे मोहित हुए महापराक्रमी रावणने उसके बल और वीर्यकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—॥ १९ ॥

‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थानको, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है॥ २० ॥

‘वहाँके सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थानमें तुमलोग अपने ही बल-पौरुषका भरोसा करके भयको दूर हटाकर रहो॥ २१ ॥

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