श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनैर्ऋत्य दिशाकी ओर चलें। संभव है, इधर जानेसे सीताका कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ'॥ २१-२२ १/२ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मणको साथ ले पृथ्वीकी ओर ध्यानसे देखते हुए दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये॥ २३ १/२ ॥
वे दोनों भाई आपसमें इसी प्रकारकी बातें करते हुए ऐसे मार्गपर जा पहुँचे, जहाँ भूमिपर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे॥ २४ १/२ ॥
पृथ्वीपर फूलोंकी उस वर्षाको देखकर वीर श्रीरामने दुःखी हो लक्ष्मणसे यह दुःखभरा वचन कहा— ॥ २५ १/२ ॥
'लक्ष्मण! मैं इन फूलोंको पहचानता हूँ। ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वनमें मैंने विदेहनन्दिनीको दिया था और उन्होंने अपने केशोंमें लगा लिया था॥ २६ १/२ ॥
'मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वीने मेरा प्रिय करनेके लिये ही इन फूलोंको सुरक्षित रखा है'॥ २७ १/२ ॥
पुरुषप्रवर लक्ष्मणसे ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीरामने झरनोंसे भरे हुए प्रस्रवण गिरिसे कहा—॥ २८ १/२ ॥
'पर्वतराज! क्या तुमने इस वनके रमणीय प्रदेशमें मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीताको देखा है?'॥ २९ १/२ ॥
तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगको देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वतसे बोले— 'पर्वत! जबतक मैं तुम्हारे सारे शिखरोंका विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चनकी-सी काया-कान्तिवाली सीताका मुझे दर्शन करा दो'॥ ३०-३१ ॥
श्रीरामके द्वारा मैथिलीके लिये ऐसा कहे जानेपर उस पर्वतने सीताको दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया। श्रीरघुनाथजीके समीप वह सीताको साक्षात् उपस्थित न कर सका॥ ३२ ॥
तब दशरथनन्दन श्रीरामने उस पर्वतसे कहा— 'अरे! तू मेरे बाणोंकी आगसे जलकर भस्मीभूत हो जायगा। किसी भी ओरसे तू सेवनके योग्य नहीं रह जायगा। तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे'॥