भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1200

तारा जब पतिके समीपसे हटायी जाने लगी, तब बारंबार उसका आलिङ्गन करती हुई वह अपनेको छुड़ाने और छटपटाने लगी। इतनेहीमें उसने अपने सामने धनुष-बाण धारण किये श्रीरामको खड़ा देखा, जो अपने तेजसे सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ २७ ॥

वे राजोचित शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे। उनके नेत्र बड़े मनोहर थे। उन पुरुषप्रवर श्रीरामको, जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, देखकर मृगशावकनयनी तारा समझ गयी कि ये ही ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम हैं॥ २८ ॥

उस समय घोर संकटमें पड़ी हुई शोकपीड़ित आर्या तारा अत्यन्त विह्वल हो गिरती-पड़ती तीव्र गतिसे महेन्द्रतुल्य दुर्जय वीर महानुभाव भगवान् श्रीरामके समीप गयी॥ २९ ॥

शोकके कारण वह अपने शरीरकी भी सुध-बुध खो बैठी थी। भगवान् श्रीराम विशुद्ध अन्तःकरणवाले तथा युद्धस्थलमें सबसे अधिक निपुणताके कारण लक्ष्य बेधनेमें अचूक थे, उनके पास पहुँचकर वह मनस्विनी तारा इस प्रकार बोली— ॥ ३० ॥

‘रघुनन्दन! आप अप्रमेय (देश, काल और वस्तुकी सीमासे रहित) हैं। आपको पाना बहुत कठिन है। आप जितेन्द्रिय तथा उत्तम धर्मका पालन करनेवाले हैं। आपकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होती। आप दूरदर्शी एवं पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं। आपकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं॥ ३१ ॥

‘आपके हाथमें धनुष और बाण शोभा पा रहे हैं। आपका बल महान् है। आप सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हैं और मनुष्य-शरीरसे प्राप्त होनेवाले लौकिक सुखका परित्याग करके भी दिव्य शरीरके ऐश्वर्यसे युक्त हैं॥ ३२ ॥

(‘अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि) आपने जिस बाणसे मेरे प्रियतम पतिका वध किया है, उसी बाणसे आप मुझे भी मार डालिये। मैं मरकर उनके समीप चली जाऊँगी। वीर! मेरे बिना वाली कहीं भी सुखी नहीं रह सकेंगे॥ ३३ ॥

‘अमलकमलदललोचन राम! स्वर्गमें जाकर भी जब वाली सब ओर दृष्टि डालनेपर मुझे नहीं देखेंगे, तब उनका मन वहाँ कदापि नहीं लगेगा; नाना प्रकारके लाल फूलोंसे विभूषित चोटी धारण करनेवाली तथा विचित्र वेशभूषासे मनोहर प्रतीत होनेवाली स्वर्गकी अप्सराओंको वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे॥ ३४ ॥

‘वीरवर! स्वर्गमें भी वाली मेरे बिना शोकका अनुभव करेंगे और उनके शरीरकी कान्ति फीकी पड़ जायगी। वे उसी तरह दुःखी रहेंगे जैसे गिरिराज ऋष्यमूकके सुरम्य तट-प्रान्तमें