श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘उस समय न दक्षिण दिशाका ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशाका ही। यद्यपि यह जगत् नियमितरूपसे स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकालमें अग्निसे दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था॥ ११ ॥
‘मेरा मन नेत्ररूपी आश्रयको पाकर उसके साथ ही हतप्राय हो गया—सूर्यके तेजसे उसकी दर्शन-शक्ति लुप्त हो गयी। तदनन्तर महान् प्रयास करके मैंने पुनः मन और नेत्रोंको सूर्यदेवमें लगाया। इस प्रकार विशेष प्रयत्न करनेपर फिर सूर्यदेवका दर्शन हुआ। वे हमें पृथ्वीके बराबर ही जान पड़ते थे॥ १२-१३ ॥
‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वीपर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाशसे नीचेकी ओर छोड़ दिया॥ १४ ॥
‘मैंने अपने दोनों पंखोंसे जटायुको ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानीके कारण वहाँ जल गया। वायुके पथसे नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थानमें गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वतपर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया॥ १५-१६ ॥
‘राज्यसे भ्रष्ट हुआ, भाईसे बिछुड़ गया और पंख तथा पराक्रमसे भी हाथ धो बैठा। अब मैं सर्वथा मरनेकी ही इच्छासे इस पर्वतशिखरसे नीचे गिरूँगा’॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१ ॥