भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पैंसठवाँ सर्ग

बारी-बारीसे वानर-वीरोंके द्वारा अपनी-अपनी गमनशक्तिका वर्णन, जाम्बवान् और अङ्गदकी बातचीत तथा जाम्बवान्‌का हनुमान्‌जीको प्रेरित करनेके लिये उनके पास जाना

अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारनेके सम्बन्धमें अपने-अपने उत्साहका—शक्तिका क्रमशः परिचय देने लगे॥ १ ॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान्—इन सबने अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन किया॥ २ ॥

इनमेंसे गजने कहा—‘मैं दस योजनकी छलाँग मार सकता हूँ।’ गवाक्ष बोले—‘मैं बीस योजनतक चला जाऊँगा’॥ ३ ॥

इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानरने उन कपिवरोंसे कहा—‘वानरो! मैं तीस योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’॥ ४ ॥

तदनन्तर कपिवर ऋषभने उन वानरोंसे कहा—‘मैं चालीस योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादनने उन वानरोंसे कहा—‘इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’॥ ६ ॥

इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरोंसे बोले—‘मैं साठ योजनतक एक छलाँगमें कूद जानेका उत्साह रखता हूँ’॥ ७ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले—‘मैं सत्तर योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है’॥ ८ ॥

इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले—‘मैं एक छलाँगमें असी योजनतक जानेकी प्रतिज्ञा करता हूँ’॥ ९ ॥

इस प्रकार कहनेवाले सब वानरोंका सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले—॥ १० ॥

‘पहले युवावस्थामें मेरे अंदर भी दूरतक छलाँग मारनेकी कुछ शक्ति थी। यद्यपि अब मैं उस अवस्थाको पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्यके लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम