भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1359

‘अतः पराक्रमी वीर! तुम अपने असीम बलका विस्तार करो। छलाँग मारनेवालोंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो। यह सारी वानरसेना तुम्हारे बल-पराक्रमको देखना चाहती है॥ ३५ ॥

‘वानरश्रेष्ठ हनुमान्! उठो और इस महासागरको लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियोंसे बढ़कर है॥ ३६ ॥

‘हनुमन्! समस्त वानर चिन्तामें पड़े हैं। तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो? महान् वेगशाली वीर! जैसे भगवान् विष्णुने त्रिलोकीको नापनेके लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ’॥ ३७ ॥

इस प्रकार वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान्की प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान्को अपने महान् वेगपर विश्वास हो आया। उन्होंने वानर वीरोंकी उस सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट्रूप प्रकट किया॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६ ॥