श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1363, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उन वनवासी वानरोंसे कहा— 'जब मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा, उस समय संसारमें कोऽइ भी मेरे वेगको धारण नहीं कर सकेगा॥ ३५१/२ ॥
'शिलाओंके समूहसे शोभा पानेवाले केवल इस महेन्द्र पर्वतके ये शिखर ही ऊँचे-ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना प्रकारके वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक ६१९
आदि धातुओंके समुदाय शोभा दे रहे हैं। इन महेन्द्र-शिखरोंपर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा॥ ३६-३७१/२ ॥
'यहाँसे सौ योजनके लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र पर्वतके ये महान् शिखर ही मेरे वेगको धारण कर सकेंगे'॥ ३८१/२ ॥
यों कहकर वायुके समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतोंमें श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये॥ ३९॥
वह पर्वत नाना प्रकारके पुष्पयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँकी हरी-हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलोंसे वह सघन जान पड़ता था और वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते थे॥ ४० ॥
महेन्द्र पर्वतके वनोंमें सिंह और बाघ भी निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियोंके समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जलके स्रोतों और झरनोंसे वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था॥ ४१ ॥
बड़े-बड़े शिखरोंसे ऊँचे प्रतीत होनेवाले महेन्द्र पर्वतपर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर-उधर टहलने लगे॥ ४२ ॥
महाकाय हनुमान्जीके दोनों पैरोंसे दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंहसे आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराजकी भाँति चीत्कार-सा करने लगा (वहाँ रहनेवाले प्राणियोंका शब्द ही मानो उसका आर्त चीत्कार था)॥ ४३ ॥
उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये। उससे नये-नये झरने फूट निकले। वहाँ रहनेवाले मृग और हाथी भयसे थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे॥ ४४ ॥
मधुपानके संसर्गसे उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वोंके जोड़े, विद्याधरोंके समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वतके विशाल शिखरोंको छोड़कर जाने लगे। बड़े-बड़े सर्प बिलोंमें