भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1387

उस पुरीके उत्तर द्वारपर पहुँचकर वानरवीर हनुमान्जी चिन्तामें पड़ गये। वह द्वार कैलास पर्वतपर बसी हुई अलकापुरीके बहिर्द्वारके समान ऊँचा था और आकाशमें रेखा-सी खींचता जान पड़ता था। ऐसा जान पड़ता था मानो अपने ऊँचे-ऊँचे प्रासादोंपर आकाशको उठा रखा है॥ २२-२३ ॥

लंकापुरी भयानक राक्षसोंसे उसी तरह भरी थी, जैसे पातालकी भोगवतीपुरी नागोंसे भरी रहती है। उसकी निर्माणकला अचिन्त्य थी। उसकी रचना सुन्दर ढंगसे की गयी थी। वह हनुमान्जीको स्पष्ट दिखायी देती थी। पूर्वकालमें साक्षात् कुबेर वहाँ निवास करते थे। हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले बहुत-से शूरवीर घोर राक्षस लंकापुरीकी उसी प्रकार रक्षा करते थे, जैसे विषधर सर्प अपनी पुरीकी करते हैं॥ २४-२५ ॥

उस नगरकी बड़ी भारी चौकसी, उसके चारों ओर समुद्रकी खाईं तथा रावण-जैसे भयंकर शत्रुको देखकर हनुमान्जी इस प्रकार विचारने लगे— ॥ २६ ॥

‘यदि वानर यहाँतक आ जायँ तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे; क्योंकि युद्धके द्वारा देवता भी लंकापर विजय नहीं पा सकते॥ २७ ॥

‘जिससे बढ़कर विषम (संकटपूर्ण) स्थान और कोई नहीं है, उस रावणपालित इस दुर्गम लंकामें आकर महाबाहु श्रीरघुनाथजी भी क्या करेंगे?॥ २८ ॥

‘राक्षसोंपर सामनीतिका प्रयोगके लिये तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इनपर दान,भेद और युद्ध (दण्ड) नीतिका प्रयोग भी सफल होता नहीं दिखायी देता॥ २९ ॥

‘यहाँ चार ही वेगशाली वानरोंकी पहुँच हो सकती है—बालिपुत्र अंगदकी, नीलकी, मेरी और बुद्धिमान् राजा सुग्रीवकी॥ ३० ॥

‘अच्छा, पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित हैं या नहीं। जनककिशोरीका दर्शन करनेके पश्चात् ही मैं इस विषयमें कोई विचार करूँगा’॥ ३१ ॥

तदनन्तर उस पर्वत-शिखरपर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये सीताजीका पता लगानेके उपायपर दो घड़ीतक विचार करते रहे॥ ३२ ॥

उन्होंने सोचा—‘मैं इस रूपसे राक्षसोंकी इस नगरीमें प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत-से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं॥ ३३ ॥