श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1410, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहात्मा हनुमान्जी अनेक प्रकारसे परमार्थ-चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले कृतात्मा (पवित्र अन्तःकरणवाले) सन्मार्गगामी तथा उत्तम दृष्टि रखनेवाले थे। इधर-उधर बहुत घूमनेपर भी जब उन महात्माको जानकीजीका पता न लगा, तब उनका मन बहुत दुःखी हो गया॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७ ॥
* जहाँ पूर्वकथित वस्तुओंके प्रति उत्तरोत्तर कथित वस्तुओंका विशेषण-भावसे स्थापन किया जाय, वहाँ ‘एकावली’ अलंकार माना गया है। इस लक्षणके अनुसार इस श्लोकमें एकावली अलंकार है। यहाँ ‘मही’ का विशेषण पर्वत, पर्वतका वृक्ष और वृक्षका विशेषण पुष्प आदि समझना चाहिये। गोविन्दराजने यहाँ ‘अधिक’ नामक अलंकार माना है, परंतु जहाँ आधारसे आधेयकी विशेषता बतायी गयी हो वही इसका विषय है; यहाँ ऐसी बात नहीं है।