श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘अथवा अब मैं नियमपूर्वक वृक्षके नीचे निवास करनेवाला तपस्वी हो जाऊँगा; किंतु उस असितलोचना सीताको देखे बिना यहाँसे कदापि नहीं लौटूँगा॥ ४५ ॥
‘यदि सीताका पता लगाये बिना ही मैं लौट जाऊँ तो समस्त वानरोंसहित अंगद जीवित नहीं रहेंगे॥ ४६ ॥
‘इस जीवनका नाश कर देनेमें बहुत-से दोष हैं। जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी-न-कभी अवश्य कल्याणका भागी होता है; अतः मैं इन प्राणोंको धारण किये रहूँगा। जीवित रहनेपर अभीष्ट वस्तु अथवा सुखकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है’॥ ४७ ॥
इस तरह मनमें अनेक प्रकारके दुःख धारण किये कपिकुञ्जर हनुमान्जी शोकका पार न पा सके॥ ४८ ॥
तदनन्तर धैर्यवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने पराक्रमका सहारा लेकर सोचा— ‘अथवा महाबली दशमुख रावणका ही वध क्यों न कर डालूँ। भले ही सीताका अपहरण हो गया हो, इस रावणको मार डालनेसे उस वैरका भरपूर बदला सध जायगा॥ ४९ ॥
‘अथवा इसे उठाकर समुद्रके ऊपर-ऊपरसे ले जाऊँ और जैसे पशुपति (रुद्र या अग्नि)-को पशु अर्पित किया जाय, उसी प्रकार श्रीरामके हाथमें इसको सौंप दूँ’॥ ५० ॥
इस प्रकार सीताजीको न पाकर वे चिन्तामें निमग्नरू हो गये। उनका मन सीताके ध्यान और शोकमें डूब गया। फिर वे वानरवीर इस प्रकार विचार करने लगे— ॥ ५१ ॥
‘जबतक मैं यशस्विनी श्रीराम-पत्नी सीताका दर्शन न कर लूँगा, तबतक इस लंकापुरीमें बारंबार उनकी खोज करता रहूँगा॥ ५२ ॥
‘यदि सम्पातिके कहनेसे भी मैं श्रीरामको यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नीको यहाँ न देखनेपर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरोंको जलाकर भस्म कर देंगे॥ ५३ ॥
‘अतः यहीं नियमित आहार और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक निवास करूँगा। मेरे कारण वे समस्त नर और वानर नष्ट न हों॥ ५४ ॥
‘इधर यह बहुत बड़ी अशोकवाटिका है, इसके भीतर बड़े-बड़े वृक्ष हैं। इसमें मैंने अभीतक अनुसंधान नहीं किया है, अतः अब इसीमें चलकर ढूँढूँगा॥ ५५ ॥
‘राक्षसोंके शोकको बढ़ानेवाला मैं यहाँसे वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और मरुद्गणोंको नमस्कार करके अशोकवाटिकामें चलूँगा॥ ५६ ॥