भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1524

दर्शनीय आभूषणोंको छातीसे लगाकर देवतुल्य आभावाले भगवान् श्रीरामने बहुत विलाप किया॥ ३९-४०१/२ ॥

‘उन आभूषणोंको बारंबार देखते, रोते और तिलमिला उठते थे। उस समय दशरथनन्दन श्रीरामकी शोकाग्नि प्रज्वलित हो उठी। उस दुःखसे आतुर हो वे महात्मा रघुवीर बहुत देरतक मूर्च्छित अवस्थामें पड़े रहे। तब मैंने नाना प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर बड़ी कठिनाईसे उन्हें उठाया॥ ४१—४३ ॥

‘लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने उन बहुमूल्य आभूषणोंको बारंबार देखा और दिखाया। फिर वे सब सुग्रीवको दे दिये॥ ४४ ॥

‘आर्ये! आपको न देख पानेके कारण श्रीरघुनाथजीको बड़ा दुःख और संताप हो रहा है। जैसे ज्वालामुखी पर्वत जलती हुई बड़ी भारी आगसे सदा तपता रहता है, उसी प्रकार वे आपकी विरहाग्निसे जल रहे हैं॥ ४५ ॥

‘आपके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीको अनिद्रा (निरन्तर जागरण), शोक और चिन्ता—ये तीनों उसी प्रकार संताप देते हैं, जैसे आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियां अग्निशालाको तपाती रहती हैं॥ ४६ ॥

‘देवि! आपको न देख पानेका शोक श्रीरघुनाथजीको उसी प्रकार विचलित कर देता है, जैसे भारी भूकम्पसे महान् पर्वत भी हिल जाता है॥ ४७ ॥

‘राजकुमारि! आपको न देखनेके कारण रमणीय काननों, नदियों और झरनोंके पास विचरनेपर भी श्रीरामको सुख नहीं मिलता है॥ ४८ ॥

‘जनकनन्दिनि! पुरुषसिंह भगवान् श्रीराम रावणको उसके मित्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर शीघ्र ही आपसे मिलेंगे॥ ४९ ॥

‘उन दिनों श्रीराम और सुग्रीव जब मित्रभावसे मिले, तब दोनोंने एक-दूसरेकी सहायताके लिये प्रतिज्ञा की। श्रीरामने वालीको मारनेका और सुग्रीवने आपकी खोज करानेका वचन दिया॥ ५० ॥

‘इसके बाद उन दोनों वीर राजकुमारोंने किष्किन्धा में जाकर वानरराज वालीको युद्धमें मार गिराया॥ ५१ ॥