श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके इस कार्यसे सभी देवता, मुनिवर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा सम्पूर्ण महान् प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके उस हर्षकी कहीं तुलना नहीं थी॥ ४६ ॥
महातेजस्वी महाकपि पवनकुमार प्रमदावनको उजाड़कर, युद्धमें राक्षसोंको मारकर और भयंकर लङ्कापुरीको जलाकर बड़ी शोभा पाने लगे॥ ४७ ॥
श्रेष्ठ भवनोंके विचित्र शिखरपर खड़े हुए वानरराजसिंह हनुमान् अपनी जलती पूँछसे उठती हुर्इ ज्वाला-मालाओंसे अलंकृत हो तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान सूर्यदेवके समान प्रकाशित होने लगे॥ ४८ ॥
इस प्रकार सारी लङ्कापुरीको पीड़ा दे वानरशिरोमणि महाकपि हनुमान्ने उस समय समुद्रके जलमें अपनी पूँछकी आग बुझायी॥ ४९ ॥
तत्पश्चात् लङ्कापुरीको दग्ध हुर्इ देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि बड़े विस्मित हुए॥ ५० ॥
उस समय वानरश्रेष्ठ महाकपि हनुमान्को देख ‘ये कालाग्नि हैं’ ऐसा मानकर समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४ ॥