श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1610, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंछप्पनवाँ सर्ग
हनुमान्जीका पुनः सीताजीसे मिलकर लौटना और समुद्रको लाँघना
तदनन्तर हनुमान्जी अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुईं जानकीजीके पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले— ‘आर्ये! सौभाग्यकी बात है कि इस समय मैं आपको सकुशल देख रहा हूँ’॥ १ ॥
सीता अपने पतिके स्नेहमें डूबी हुईं थीं। वे हनुमान्जीको प्रस्थान करनेके लिये उद्यत जान उन्हें बारम्बार देखती हुईं बोलीं—॥ २ ॥
‘तात! निष्पाप वानरवीर! यदि तुम उचित समझो तो एक दिन और यहाँ किसी गुप्त स्थानमें ठहर जाओ, आज विश्राम करके कल चले जाना॥ ३ ॥
‘वानरप्रवर! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीका अपार शोक भी थोड़ी देरके लिये कम हो जायगा॥ ४ ॥
‘कपिश्रेष्ठ! वानरशिरोमणे! जब तुम चले जाओगे, तब फिर तुम्हारे आनेतक मेरे प्राण रहेंगे या नहीं, इसका कोई विश्वास नहीं है॥ ५ ॥
‘वीर! मुझपर दुःख-पर-दुःख पड़ते गये हैं। मैं मानसिक शोकसे दिन-दिन दुर्बल होती जा रही हूँ। अब तुम्हारा दर्शन न होना मेरे हृदयको और भी विदीर्ण करता रहेगा॥ ६ ॥
‘वीर! मेरे सामने यह संदेह अभीतक बना ही हुआ है कि बड़े-बड़े वानरों और रीछोंके सहायक होनेपर भी महाबली सुग्रीव इस दुर्लङ्घ्य समुद्रको कैसे पार करेंगे? उनकी सेनाके वे वानर और भालू तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भी इस महासागरको कैसे लाँघ सकेंगे?॥ ७-८ ॥
‘तीन ही प्राणियोंमें इस समुद्रको लाँघनेकी शक्ति है—तुममें, गरुड़में अथवा वायुदेवतामें॥ ९ ॥
‘इस कार्यसम्बन्धी दुष्कर प्रतिबन्धके उपस्थित होनेपर तुम्हें क्या समाधान दिखायी देता है ? बताओ, क्योंकि तुम कार्यकुशल हो॥ १० ॥
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कपिश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्यको सिद्ध करनेमें तुम अकेले ही पूर्ण समर्थ हो; परंतु तुम्हारे द्वारा जो विजयरूप फलकी प्राप्ति होगी, उससे तुम्हारा ही यश बढ़ेगा, भगवान् श्रीरामका नहीं॥ ११ ॥