भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1640

वानरराज सुग्रीवके उस मनोरम महावनके पास पहुँचकर वे सभी वानर वहाँका मधु पीने और फल खाने आदिके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये॥ १० ॥

तब हर्षसे भरे हुए तथा मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले उन वानरोंने उस महान् मधुवनको देखकर कुमार अङ्गदसे मधुपान करनेकी आज्ञा माँगी॥ ११ ॥

उस समय कुमार अङ्गदने जाम्बवान् आदि बड़े-बूढ़े वानरोंकी अनुमति लेकर उन सबको मधु पीनेकी आज्ञा दे दी॥ १२ ॥

बुद्धिमान् वालिपुत्र राजकुमार अङ्गदकी आज्ञा पाकर वे वानर भौंरोंके झुंडसे भरे हुए वृक्षोंपर चढ़ गये॥ १३ ॥

वहाँके सुगन्धित फल-मूलोंका भक्षण करते हुए उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुऽइ। वे सभी मदसे उन्मत्त हो गये॥ १४ ॥

युवराजकी अनुमति मिल जानेसे सभी वानरोंको बड़ा हर्ष हुआ। वे आनन्दमग्न होकर इधर-उधर नाचने लगे॥ १५ ॥

कोऽइ गाते, कोऽइ हँसते, कोऽइ नाचते, कोऽइ नमस्कार करते, कोऽइ गिरते-पड़ते, कोऽइ जोर-जोरसे चलते, कोऽइ उछलते-कूदते और कोऽइ प्रलाप करते थे॥ १६ ॥

कोऽइ एक-दूसरेके पास जाकर मिलते, कोऽइ आपसमें विवाद करते, कोऽइ एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर दौड़ जाते और कोऽइ वृक्षोंकी डालियोंसे पृथ्वीपर कूद पड़ते थे॥

कितने ही प्रचण्ड वेगवाले वानर पृथ्वीसे दौड़कर बड़े-बड़े वृक्षोंकी चोटियोंतक पहुँच जाते थे। कोऽइ गाता तो दूसरा उसके पास हँसता हुआ जाता था। कोऽइ हँसते हुएके पास जोर-जोरसे रोता हुआ पहुँचता था॥ १८ ॥

कोऽइ दूसरेको पीड़ा देता तो दूसरा उसके पास बड़े जोरसे गर्जना करता हुआ आता था। इस प्रकार वह सारी वानरसेना मदोन्मत्त होकर उसके अनुरूप चेष्टा कर रही थी। वानरोंके उस समुदायमें कोऽइ भी ऐसा नहीं था, जो मतवाला न हो गया हो और कोऽइ भी ऐसा नहीं था, जो दर्पसे भर न गया हो॥ १९ ॥

तदनन्तर मधुवनके फल-मूल आदिका भक्षण होता और वहाँके वृक्षोंके पत्तों एवं फूलोंको नष्ट किया जाता देख दधिमुख नामक वानरको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन वानरोंको वैसा करनेसे रोका॥ २० ॥