श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1654, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपैंसठवाँ सर्ग
हनुमान्जीका श्रीरामको सीताका समाचार सुनाना
तदनन्तर विचित्र काननोंसे सुशोभित प्रस्रवण पर्वतपर जाकर युवराज अङ्गदको आगे करके श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा सुग्रीवको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर सब वानरोंने सीताका समाचार बताना आरम्भ किया— ॥ १-२ ॥
‘सीता देवी रावणके अन्तःपुरमें रोक रखी गयी हैं। राक्षसियाँ उन्हें धमकाती रहती हैं। श्रीरामके प्रति उनका अनन्य अनुराग है। रावणने सीताके जीवित रहनेके लिये केवल दो मासकी अवधि दे रखी है। इस समय विदेहकुमारीको कोई क्षति नहीं पहुँची है—वे सकुशल हैं।’ श्रीरामचन्द्रजीके निकट ये सब बातें बताकर वे वानर चुप हो गये। विदेहकुमारीके सकुशल होनेका वृत्तान्त सुनकर श्रीरामने आगेकी बात पूछते हुए कहा— ॥ ३-४ ॥
‘वानरो ! देवी सीता कहाँ हैं ? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है? विदेहकुमारीके विषयमें ये सारी बातें मुझसे कहो’ ॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह कथन सुनकर वे वानर श्रीरामके निकट सीताके वृत्तान्तको अच्छी तरह जाननेवाले हनुमान्जीको उत्तर देनेके लिये प्रेरित करने लगे॥ ६ ॥
उन वानरोंकी बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान्जीने पहले देवी सीताके उद्देश्यसे दक्षिण दिशाकी ओर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया॥ ७ ॥
फिर बातचीतकी कलाको जाननेवाले उन वानरवीरने सीताजीका दर्शन जिस प्रकार हुआ था, वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तत्पश्चात् अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाली उस दिव्य काञ्चनमणिको भगवान् श्रीरामके हाथमें देकर हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले— ॥ ८१/२ ॥
‘प्रभो! मैं जनकनन्दिनी सीताके दर्शनकी इच्छासे उनका पता लगाता हुआ सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघकर उसके दक्षिण किनारेपर जा पहुँचा॥ ९१/२ ॥
‘वहीं दुरात्मा रावणकी नगरी लङ्का है। वह समुद्रके दक्षिण तटपर ही बसी हुई है॥ १०१/२ ॥
‘श्रीराम! लङ्कामें पहुँचकर मैंने रावणके अन्तःपुरमें प्रमदावनके भीतर राक्षसियोंके बीचमें बैठी हुई सती-साध्वी सुन्दरी देवी सीताका दर्शन किया। वे अपनी सारी अभिलाषाओंको