श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1672, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा सर्ग
हनुमान्जीका लङ्काके दुर्ग, फाटक, सेना-विभाग और संक्रम आदिका वर्णन करके भगवान् श्रीरामसे सेनाको कूच करनेकी आज्ञा देनेके लिये प्रार्थना करना
सुग्रीवके ये युक्तियुक्त और उत्तम अभिप्रायसे पूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें स्वीकार किया और फिर हनुमान्जीसे कहा— ॥ १ ॥
‘मैं तपस्यासे पुल बाँधकर और समुद्रको सुखाकर सब प्रकारसे महासागरको लाँघ जानेमें समर्थ हूँ॥ २ ॥
‘वानरवीर! तुम मुझे यह तो बताओ कि उस दुर्गम लङ्कापुरीके कितने दुर्ग हैं। मैं देखे हुएके समान उसका सारा विवरण स्पष्टरूपसे जानना चाहता हूँ॥ ३ ॥
‘तुमने रावणकी सेनाका परिमाण, पुरीके दरवाजोंको दुर्गम बनानेके साधन, लङ्काकी रक्षाके उपाय तथा राक्षसोंके भवन—इन सबको सुखपूर्वक यथावत्-रूपसे वहाँ देखा है। अतः इन सबका ठीक-ठीक वर्णन करो; क्योंकि तुम सब प्रकारसे कुशल हो’॥ ४-५ ॥
श्रीरघुनाथजीका यह वचन सुनकर वाणीके मर्मको समझनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान्ने श्रीरामसे फिर कहा— ॥ ६ ॥
‘भगवन्! सुनिये। मैं सब बातें बता रहा हूँ। लङ्काके दुर्ग किस विधिसे बने हैं, किस प्रकार लङ्कापुरीकी रक्षाकी व्यवस्था की गयी है, किस तरह वह सेनाओंसे सुरक्षित है, रावणके तेजसे प्रभावित हो राक्षस उसके प्रति कैसा स्नेह रखते हैं, लङ्काकी समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र कितना भयंकर है, पैदल सैनिकोंका विभाग करके कहाँ कितने सैनिक रखे गये हैं और वहाँके वाहनोंकी कितनी संख्या है—इन सब बातोंका मैं वर्णन करूँगा। ऐसा कहकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने वहाँकी बातोंको ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया॥ ७—९ ॥
‘प्रभो! लङ्कापुरी हर्ष और आमोद-प्रमोदसे पूर्ण है। वह विशाल पुरी मतवाले हाथियोंसे व्याप्त तथा असंख्य रथोंसे भरी हुई है। राक्षसोंके समुदाय सदा उसमें निवास करते हैं॥ १० ॥
‘उस पुरीके चार बड़े-बड़े दरवाजे हैं, जो बहुत लंबे-चौड़े हैं। उनमें बहुत मजबूत किवाड़ लगे हैं और मोटी-मोटी अर्गलाएँ हैं॥ ११ ॥