भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1674

‘वह दुर्गम पुरी पर्वतके शिखरपर बसायी गयी है और देवपुरीके समान सुन्दर दिखायी देती है, हाथी, घोड़ोंसे भरी हुई वह लङ्का अत्यन्त दुर्जय है॥ २२ ॥

‘खाइयाँ, शतघ्नियों और तरह-तरहके यन्त्र दुरात्मा रावणकी उस लङ्कानगरीकी शोभा बढ़ाते हैं॥ २३ ॥

‘लङ्काके पूर्वद्वारपर दस हजार राक्षस रहते हैं, जो सब-के-सब हाथोंमें शूल धारण करते हैं। वे अत्यन्त दुर्जय और युद्धके मुहानेपर तलवारोंसे जूझनेवाले हैं॥

‘लङ्काके दक्षिण द्वारपर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक लाख राक्षस योद्धा डटे रहते हैं। वहाँके सैनिक भी बड़े बहादुर हैं॥ २५ ॥

‘पुरीके पश्चिम द्वारपर दस लाख राक्षस निवास करते हैं। वे सब-के-सब ढाल और तलवार धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हैं॥ २६ ॥

‘उस पुरीके उत्तर द्वारपर एक अर्बुद (दस करोड़) राक्षस रहते हैं। जिनमेंसे कुछ तो रथी हैं और कुछ घुड़सवार। वे सभी उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपनी वीरताके लिये प्रशंसित हैं॥ २७ ॥

‘लङ्काके मध्यभागकी छावनीमें सैकड़ों सहस्र दुर्जय राक्षस रहते हैं, जिनकी संख्या एक करोड़से अधिक है॥

‘किंतु मैंने उन सब संक्रमणोंको तोड़ डाला है, खाइयाँ पाट दी हैं, लङ्कापुरीको जला दिया है और उसके परकोटोंको भी धराशायी कर दिया है। इतना ही नहीं, वहाँके विशालकाय राक्षसोंकी सेनाका एक चौथाई भाग नष्ट कर डाला है॥ २९ ॥

‘हमलोग किसी-न-किसी मार्ग या उपायसे एक बार समुद्रको पार कर लें; फिर तो लङ्काको वानरोंके द्वारा नष्ट हुई ही समझिये॥ ३० ॥

‘अङ्गद, द्विविद, मैन्द, जाम्बवान्, पनस, नल और सेनापति नील—इतने ही वानर लङ्काविजय करनेके लिये पर्याप्त हैं। बाकी सेना लेकर आपको क्या करना है?॥

‘रघुनन्दन! ये अङ्गद आदि वीर आकाशमें उछलते-कूदते हुए रावणकी महापुरी लङ्कामें पहुँचकर उसे पर्वत, वन, खाई, दरवाजे, परकोटे और मकानोंसहित नष्ट करके सीताजीको यहाँ ले आयेंगे॥ ३२ ॥

‘ऐसा समझकर आप शीघ्र ही समस्त सैनिकोंको सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करके कूच करनेकी आज्ञा दीजिये और उचित मुहूर्तसे प्रस्थानकी इच्छा कीजिये’॥ ३३ ॥