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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1698, कुल 2621 में से

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नवाँ सर्ग

विभीषणका रावणसे श्रीरामकी अजेयता बताकर सीताको लौटा देनेके लिये अनुरोध करना

तत्पश्चात् निकुम्भ, रभस, महाबली सूर्यशत्रु, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, महापार्श्व, महोदर, दुर्जय अग्निकेतु, राक्षस रश्मिकेतु, महातेजस्वी बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित्, प्रहस्त, विरूपाक्ष, महाबली वज्रदंष्ट्र, धूम्राक्ष, अतिकाय और निशाचर दुर्मुख—ये सब राक्षस अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें परिघ, पट्टिश, शूल, प्रास, शक्ति, फरसे, धनुष, बाण तथा पैनी धारवाले बड़े-बड़े खड्ग लिये उछलकर रावणके सामने आये और अपने तेजसे उद्दीप्त-से होकर वे सब-के-सब उससे बोले—॥ १–५ ॥

‘हमलोग आज ही राम, सुग्रीव, लक्ष्मण और उस कायर हनुमान्को भी मार डालेंगे, जिसने लङ्कापुरी जलायी है’॥ ६ ॥

हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये खड़े हुए उन सब राक्षसोंको जानेके लिये उद्यत देख विभीषणने रोका और पुनः उन्हें बिठाकर दोनों हाथ जोड़ रावणसे कहा—॥ ७ ॥

‘तात! जो मनोरथ साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे प्राप्त न हो सके, उसीकी प्राप्तिके लिये नीतिशास्त्रके ज्ञाता मनीषी विद्वानोंने पराक्रम करनेके योग्य अवसर बताये हैं॥ ८ ॥

‘तात! जो शत्रु असावधान हों, जिनपर दूसरे-दूसरे शत्रुओंने आक्रमण किया हो तथा जो महारोग आदिसे ग्रस्त होनेके कारण दैवसे मारे गये हों, उन्हींपर भलीभाँति परीक्षा करके विधिपूर्वक किये गये पराक्रम सफल होते हैं॥ ९ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी बेखबर नहीं हैं। वे विजयकी इच्छासे आ रहे हैं और उनके साथ सेना भी है। उन्होंने क्रोधको सर्वथा जीत लिया है। अतः वे सर्वथा दुर्जय हैं। ऐसे अजेय वीरको तुमलोग परास्त करना चाहते हो॥ १० ॥

‘निशाचरो! नदों और नदियोंके स्वामी भयंकर महासागरको जो एक ही छलाँगमें लाँघकर यहाँतक आ पहुँचे थे, उन हनुमान्जीकी गतिको इस संसारमें कौन जान सकता है अथवा कौन उसका अनुमान लगा सकता है? शत्रुओंके पास असंख्य सेनाएँ हैं, उनमें असीम बल और

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