श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1701, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ सर्ग
विभीषणका रावणके महलमें जाना, उसे अपशकुनोंका भय दिखाकर सीताको लौटा देनेके लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना
दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावणके घर गये। वह घर अनेक प्रासादोंके कारण पर्वतशिखरोंके समूहकी भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटीको लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंगसे बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषोंका वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजाके प्रति अनुराग रखनेवाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधनमें कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओरसे उस भवनकी रक्षा करते थे। वहाँकी वायु मतवाले हाथियोंके निःश्वाससे मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्ख-ध्वनिके समान राक्षसोंका गम्भीर घोष वहाँ गूँजता रहता था। नाना प्रकारके वाद्योंके मनोरम शब्द उस भवनको निनादित करते थे। रूप और यौवनके मदसे मतवाली युवतियोंकी वहाँ भीड़-सी लगती रहती थी। वहाँके बड़े-बड़े मार्ग लोगोंके वार्तालापसे मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्णके बने हुए थे। उत्तम सजावटकी वस्तुओंसे वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वोंके आवास और देवताओंके निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह नागभवनके समान उद्भासित होता था। जैसे तेजसे विस्तृत किरणोंवाले सूर्य महान् मेघोंकी घटामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषणने रावणके उस भवनमें पदार्पण किया॥ १—७ ॥
वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषणने अपने भाईकी विजयके उद्देश्यसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा किये गये पुण्याहवाचनके पवित्र घोष सुने॥ ८ ॥
तत्पश्चात् उन महाबली विभीषणने वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंका दर्शन किया, जिनके हाथोंमें दही और घीके पात्र थे। फूलों और अक्षतोंसे उन सबकी पूजा की गयी थी॥ ९ ॥
वहाँ जानेपर राक्षसोंने उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर उन महाबाहु विभीषणने अपने तेजसे देदीप्यमान और सिंहासनपर विराजमान कुबेरके छोटे भाई रावणको प्रणाम किया॥ १० ॥