भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1706, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1706

उस समय दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ोंसे व्याप्त हुई वह पुरी बहुसंख्यक गरुड़ोंसे आच्छादित हुए आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी॥ २१ ॥

गन्तव्य स्थानतक पहुँचकर अपने-अपने वाहनों और नाना प्रकारकी सवारियोंको बाहर ही रखकर वे सब सभासद् पैदल ही उस सभाभवनमें प्रविष्ट हुए, मानो बहुत-से सिंह किसी पर्वतकी कन्दरामें घुस रहे हों॥ २२ ॥

वहाँ पहुँचकर उन सबने राजाके पाँव पकड़े तथा राजाने भी उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् कुछ लोग सोनेके सिंहासनोंपर, कुछ लोग कुशकी चटाइयोंपर और कुछ लोग साधारण बिछौनोंसे ढकी हुई भूमिपर ही बैठ गये॥ २३ ॥

राजाकी आज्ञासे उस सभामें एकत्र होकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावणके आसपास यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये॥ २४ ॥

यथायोग्य भिन्न-भिन्न विषयोंके लिये उचित सम्मति देनेवाले मुख्य-मुख्य मन्त्री, कर्तव्य-निश्चयमें पाण्डित्यका परिचय देनेवाले सचिव, बुद्धिदर्शी, सर्वज्ञ, सद्गुण-सम्पन्न उपमन्त्री तथा और भी बहुत-से शूरवीर सम्पूर्ण अर्थोंके निश्चयके लिये और सुखप्राप्तिके उपायपर विचार करनेके लिये उस सुनहरी कान्तिवाली सभाके भीतर सैकड़ोंकी संख्यामें उपस्थित थे॥ २५-२६ ॥

तत्पश्चात् यशस्वी महात्मा विभीषण भी एक सुवर्णजटित, सुन्दर अश्वोंसे युक्त, विशाल, श्रेष्ठ एवं शुभकारक रथपर आरूढ़ हो अपने बड़े भाईकी सभामें जा पहुँचे॥ २७ ॥

छोटे भाई विभीषणने पहले अपना नाम बताया, फिर बड़े भाईके चरणोंमें मस्तक झुकाया। इसी तरह शुक और प्रहस्तने भी किया। तब रावणने उन सबको यथायोग्य पृथक्-पृथक् आसन दिये॥ २८ ॥

सुवर्ण एवं नाना प्रकारकी मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित उन सुन्दर वस्त्रधारी राक्षसोंकी उस सभामें सब ओर बहुमूल्य अगुरु, चन्दन तथा पुष्पहारोंकी सुगन्ध छा रही थी॥ २९ ॥

उस समय उस सभाका कोई भी सदस्य असत्य नहीं बोलता था। वे सभी सभासद् न तो चिल्लाते थे और न जोर-जोरसे बातें ही करते थे। वे सब-के-सब सफलमनोरथ एवं भयंकर पराक्रमी थे और सभी अपने स्वामी रावणके मुँहकी ओर देख रहे थे॥ ३० ॥

उस सभामें शस्त्रधारी महाबली मनस्वी वीरोंका समागम होनेपर उनके बीचमें बैठा हुआ मनस्वी रावण अपनी प्रभासे उसी प्रकार प्रकाशित हो रहा था, जैसे वसुओंके बीचमें वज्रधारी इन्द्र देदीप्यमान होते हैं॥ ३१ ॥

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