भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1709

‘मैंने जो काम किया है, उसे मैं पहले ही आप सबके सामने रखकर आपके द्वारा उसका समर्थन चाहता था, परंतु उस समय कुम्भकर्ण सोये हुए थे, इसलिये मैंने इसकी चर्चा नहीं चलायी॥ १० ॥

‘समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबली कुम्भकर्ण छः महीनेसे सो रहे थे। अभी इनकी नींद खुली है॥ ११ ॥

‘मैं दण्डकारण्यसे, जो राक्षसोंके विचरनेका स्थान है, रामकी प्यारी रानी जनकदुलारी सीताको हर लाया हूँ॥ १२ ॥

‘किंतु वह मन्दगामिनी सीता मेरी शय्यापर आरूढ़ होना नहीं चाहती है। मेरी दृष्टिमें तीनों लोकोंके भीतर सीताके समान सुन्दरी दूसरी कोई स्त्री नहीं है॥ १३ ॥

‘उसके शरीरका मध्यभाग अत्यन्त सूक्ष्म है, कटिके पीछेका भाग स्थूल है, मुख शरत्कालके चन्द्रमाको लज्जित करता है, वह सौम्य रूप और स्वभाववाली सीता सोनेकी बनी हुई प्रतिमा-सी जान पड़ती है। ऐसा लगता है, जैसे वह मयासुरकी रची हुई कोई माया हो॥ १४ ॥

‘उसके चरणोंके तलवे लाल रंगके हैं। दोनों पैर सुन्दर, चिकने और सुडौल हैं तथा उनके नख ताँबे-जैसे लाल हैं। सीताके उन चरणोंको देखकर मेरी कामाग्नि प्रज्वलित हो उठती है॥ १५ ॥

‘जिसमें घीकी आहुति डाली गयी हो, उस अग्निकी लपट और सूर्यकी प्रभाके समान इस तेजस्विनी सीताको देखकर तथा ऊँची नाक और विशाल नेत्रोंसे सुशोभित उसके निर्मल एवं मनोहर मुखका अवलोकन करके मैं अपने वशमें नहीं रह गया हूँ। कामने मुझे अपने अधीन कर लिया है॥ १६ १/२ ॥

‘जो क्रोध और हर्ष दोनों अवस्थाओंमें समानरूपसे बना रहता है, शरीरकी कान्तिको फीकी कर देता है और शोक तथा संतापके समय भी कभी मनसे दूर नहीं होता, उस कामने मेरे हृदयको कलुषित (व्याकुल) कर दिया है॥ १७ १/२ ॥

‘विशाल नेत्रोंवाली माननीय सीताने मुझसे एक वर्षका समय माँगा है। इस बीचमें वह अपने पति श्रीरामकी प्रतीक्षा करेगी। मैंने मनोहर नेत्रोंवाली सीताके उस सुन्दर वचनको सुनकर उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है*॥ १८-१९ ॥