श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1714, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘एक बार मैंने आकाशमें अग्निशिखाके समान प्रकाशित होती हुई पुञ्जिकस्थला नामकी अप्सराको देखा, जो पितामह ब्रह्माजीके भवनकी ओर जा रही थी। वह अप्सरा मेरे भयसे लुकती-छिपती आगे बढ़ रही थी॥
‘मैंने बलपूर्वक उसके वस्त्र उतार दिये और हठात् उसका उपभोग किया। इसके बाद वह ब्रह्माजीके भवनमें गयी। उसकी दशा हाथीद्वारा मसलकर फेंकी हुई कमलिनीके समान हो रही थी॥ १२ ॥
‘मैं समझता हूँ कि मेरे द्वारा उसकी जो दुर्दशा की गयी थी, वह पितामह ब्रह्माजीको ज्ञात हो गयी। इससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे और मुझसे इस प्रकार बोले— ॥ १३ ॥
‘आजसे यदि तू किसी दूसरी नारीके साथ बलपूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है’॥ १४ ॥
‘इस तरह मैं ब्रह्माजीके शापसे भयभीत हूँ। इसीलिये अपनी शुभ-शय्यापर विदेहकुमारी सीताको हठात् एवं बलपूर्वक नहीं चढ़ाता हूँ॥ १५ ॥
‘मेरा वेग समुद्रके समान है और मेरी गति वायुके तुल्य है। इस बातको दशरथनन्दन राम नहीं जानते हैं, इसीसे वे मुझपर चढ़ाई करते हैं॥ १६ ॥
‘अन्यथा पर्वतकी कन्दरामें सुखपूर्वक सोये हुए सिंहके समान तथा कुपित होकर बैठी हुई मृत्युके तुल्य भयंकर मुझ रावणको कौन जगाना चाहेगा?॥ १७ ॥
‘मेरे धनुषसे छूटे हुए दो जीभवाले सर्पोंके समान भयंकर बाणोंको समराङ्गणमें श्रीरामने कभी देखा नहीं है, इसीलिये वे मुझपर चढ़े आ रहे हैं॥ १८ ॥
‘मैं अपने धनुषसे शीघ्रतापूर्वक छूटे हुए सैकड़ों वज्रसदृश बाणोंद्वारा रामको उसी प्रकार जला डालूँगा, जैसे लोग उल्काओंद्वारा हाथीको उसे भगानेके लिये जलाते हैं॥ १९ ॥
‘जैसे प्रातःकाल उदित हुए सूर्यदेव नक्षत्रोंकी प्रभाको छीन लेते हैं, उसी प्रकार अपनी विशाल सेनासे घिरा हुआ मैं उनकी उस वानर-सेनाको आत्मसात् कर लूँगा॥ २० ॥
युद्धमें तो हजार नेत्रोंवाले इन्द्र और वरुण भी मेरा सामना नहीं कर सकते। पूर्वकालमें कुबेरके द्वारा पालित हुई इस लङ्कापुरीको मैंने अपने बाहुबलसे ही जीता था’॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
१३ ॥