श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1716, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो सकती है॥ १० ॥
‘प्रहस्त! श्रीराम अर्थविशारद हैं—समस्त कार्योंके साधनमें कुशल हैं। जैसे बिना जहाज या नौकाके कोई महासागरको पार नहीं कर सकता, उसी प्रकार मुझसे, तुमसे अथवा समस्त राक्षसोंसे भी श्रीरामका वध होना कैसे सम्भव है?॥ ११ ॥
‘श्रीराम धर्मको ही प्रधान वस्तु मानते हैं। उनका प्रादुर्भाव इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है। वे सभी कार्योंके सम्पादनमें समर्थ और महारथी वीर हैं (उन्होंने विराध, कबन्ध और वाली-जैसे वीरोंको बात-की-बातमें यमलोक भेज दिया था)। ऐसे प्रसिद्ध पराक्रमी राजा श्रीरामसे सामना पड़नेपर तो देवता भी अपनी हेकड़ी भूल जायँगे (फिर हमारी-तुम्हारी तो बात ही क्या है?)॥ १२ ॥
‘प्रहस्त! अभीतक श्रीरामके चलाये हुए कङ्कपत्रयुक्त, दुर्जय एवं तीखे बाण तुम्हारे शरीरको विदीर्ण करके भीतर नहीं घुसे हैं; इसीलिये तुम बढ़-बढ़कर बोल रहे हो॥ १३ ॥
‘प्रहस्त! श्रीरामके बाण वज्रके समान वेगशाली होते हैं। वे प्राणोंका अन्त करके ही छोड़ते हैं। श्रीरघुनाथजीके धनुषसे छूटे हुए वे तीखे बाण तुम्हारे शरीरको फोड़कर अंदर नहीं घुसे हैं; इसीलिये तुम इतनी शेखी बघारते हो॥ १४ ॥
‘रावण, महाबली त्रिशिरा, कुम्भकर्णकुमार निकुम्भ और इन्द्रविजयी मेघनाद भी समराङ्गणमें इन्द्रतुल्य तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीरामका वेग सहन करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ १५ ॥
‘देवान्तक, नरान्तक, अतिकाय, महाकाय, अतिरथ तथा पर्वतके समान शक्तिशाली अकम्पन भी युद्धभूमिमें श्रीरघुनाथजीके सामने नहीं ठहर सकते हैं॥ १६ ॥
‘ये महाराज रावण तो व्यसनोंके* वशीभूत हैं, इसलिये सोच-विचारकर काम नहीं करते हैं। इसके सिवा ये स्वभावसे ही कठोर हैं तथा राक्षसोंके सत्यानाशके लिये तुम-जैसे शत्रुतुल्य मित्रकी सेवामें उपस्थित रहते हैं॥
‘अनन्त शारीरिक बलसे सम्पन्न, सहस्र फनवाले और महान् बलशाली भयंकर नागने इस राजाको बलपूर्वक अपने शरीरसे आवेष्टित कर रखा है। तुम सब लोग मिलकर इसे बन्धनसे बाहर करके प्राणसंकटसे बचाओ (अर्थात् श्रीरामचन्द्रजीके साथ वैर बाँधना महान् सर्पके शरीरसे आवेष्टित होनेके समान है। इस भावको व्यक्त करनेके कारण यहाँ निदर्शना अलङ्कार व्यंग्य है)॥ १८ ॥
‘इस राजासे अबतक आपलोगोंकी सभी कामनाएँ पूर्ण हुई हैं। आप सब लोग इसके हितैषी सुहृद् हैं। अतः जैसे भयंकर बलशाली भूतोंसे गृहीत हुए पुरुषको उसके हितैषी